सुपरिंटेंडेंट आर्कियोलॉजिस्ट डॉ. अभिजीत आंबेकर की लीडरशिप में आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया की एक टीम आइलैंड के पूर्वी हिस्से में ‘मोरबंदर’ इलाके में काम कर रही है।इस काम का मकसद आइलैंड पर पुरानी बस्तियों के नेचर और फैलाव का पता लगाना और उनकी क्रोनोलॉजी पता लगाना है। घारापुरी में मिले स्ट्रक्चर में एक रेक्टेंगुलर तालाब (झील) है।(A 1,500-year-old structure has been discovered on Gharapuri Island)
स्ट्रक्चर को इंग्लिश ‘T’ शेप का शेप मिला
पानी की सप्लाई के नज़रिए से, इसे सीढ़ियों के स्ट्रक्चर के ज़रिए इंग्लिश ‘T’ शेप के तालाब से जोड़ा गया है।आंबेकर ने कहा, ‘इस साइट पर मिली ज़रूरी खोजों में से एक बहुत बड़ा स्ट्रक्चर है, जो लगभग 14.7 मीटर लंबा और 6.7 मीटर चौड़ा और 10.8 मीटर ऊंचा है।इससे इस स्ट्रक्चर को इंग्लिश ‘T’ शेप का शेप मिला है। खुदाई का काम अब तक पांच मीटर की गहराई तक पहुंच चुका है।
साथ ही, इसमें सीढ़ियों की 20 सीढ़ियां भी मिली हैं। ये सीढ़ियां पत्थरों से बनी हैं, और ये पत्थर एलीफेंटा आइलैंड के नहीं हैं।’ मुंबई के पास घारापुरी आइलैंड चट्टानों में बनी अपनी शानदार गुफाओं के लिए जाना जाता है। पानी जमा करने के लिए इस्तेमाल होने वाले ऐसे टैंक यहां पहले भी मिले हैं।
स्ट्रक्चर बहुत सोच-समझकर और कुशलता से बनाया गया
लेकिन पानी के लिए यह स्ट्रक्चर बहुत सोच-समझकर और कुशलता से बनाया गया है।हालांकि आइलैंड पर बहुत बारिश होती है, लेकिन ज़मीन की चट्टानी सतह की वजह से पानी के रिसने की स्पीड बहुत धीमी है और ज़्यादातर पानी समुद्र में बह जाता है।
आर्कियोलॉजिस्ट को ‘इंडो-मेडिटेरेनियन’ (रोमन) मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े, साथ ही दूसरे बाहर से आए मिट्टी के बर्तन और कांच मिले हैं।इससे दो दूर के इलाकों के बीच लेन-देन का पता चलता है। घारापुरी कोई धार्मिक जगह नहीं थी, बल्कि समुद्री रास्तों के एक बड़े नेटवर्क का हब थी।यहां खुदाई में बाहर से आए मिट्टी के बर्तन भी मिले हैं, साथ ही कुछ सिक्के भी मिले हैं, जो तांबे और लेड के बने हैं।
पुणे में ‘डेक्कन कॉलेज पोस्टग्रेजुएट एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट’ के प्रो. अभिजीत दांडेकर ने कहा कि यह साफ हो गया है कि तांबे के दो सिक्के कलचुरी वंश के ‘कृष्णराज’ के हैं।
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