वॉशिंगटन। अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने व्हाइट हाउस के सिचुएशन रूम में राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े शीर्ष अधिकारियों के साथ महत्वपूर्ण बैठक की। करीब दो घंटे तक चली इस बैठक में ईरान के साथ संभावित समझौते, युद्धविराम की स्थिति और होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने जैसे अहम मुद्दों पर चर्चा हुई। हालांकि बैठक के बाद भी किसी अंतिम निर्णय की घोषणा नहीं की गई।
अमेरिकी प्रशासन के सूत्रों के अनुसार, ट्रंप किसी भी समझौते को लेकर जल्दबाजी में नहीं हैं और वह चाहते हैं कि ईरान पहले अपने परमाणु कार्यक्रम को लेकर स्पष्ट और ठोस प्रतिबद्धता दिखाए। अमेरिकी पक्ष का कहना है कि ईरान को यह सुनिश्चित करना होगा कि वह भविष्य में परमाणु हथियार विकसित नहीं करेगा।
सूत्रों के मुताबिक अमेरिका की प्रमुख चिंता ईरान के पास मौजूद उच्च स्तर के संवर्धित यूरेनियम का भंडार है। वॉशिंगटन का मानना है कि इस सामग्री को अंतरराष्ट्रीय निगरानी में नष्ट किया जाना चाहिए ताकि परमाणु हथियार निर्माण की आशंकाओं को समाप्त किया जा सके।
वार्ता में होर्मुज जलडमरूमध्य का मुद्दा भी प्रमुखता से उठा। दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में शामिल इस जलमार्ग पर तनाव के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार प्रभावित हुआ है। प्रस्तावित समझौते के तहत ईरान को समुद्री मार्ग से लगाए गए अवरोध हटाने और जहाजों की आवाजाही सामान्य करने की शर्त रखी गई है। इसके बदले में अमेरिका प्रतिबंधों में कुछ राहत देने और तेल निर्यात पर लगी बाधाओं को कम करने पर विचार कर सकता है।
पृष्ठभूमि में हाल के महीनों में क्षेत्रीय तनाव तेजी से बढ़ा है। दोनों देशों के बीच सैन्य गतिविधियों और प्रतिबंधों की श्रृंखला ने हालात को और जटिल बना दिया है। इसके बावजूद कूटनीतिक स्तर पर संपर्क बना हुआ है और दोनों पक्ष बातचीत जारी रखे हुए हैं।
उधर ईरानी नेतृत्व ने अमेरिकी प्रस्तावों को लेकर सतर्क रुख अपनाया है। तेहरान का कहना है कि उसकी प्राथमिकता क्षेत्र में संघर्ष को समाप्त करना है और वह किसी भी समझौते में अपने आर्थिक तथा रणनीतिक हितों से समझौता नहीं करेगा। ईरानी अधिकारियों ने यह भी संकेत दिया है कि प्रतिबंधों में राहत और विदेशों में फंसी संपत्तियों की वापसी उनके लिए महत्वपूर्ण मुद्दे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दोनों पक्षों के बीच सहमति बनती है तो इसका असर केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक तेल बाजार, मध्य पूर्व की सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर भी पड़ेगा। फिलहाल सभी की निगाहें आने वाले दिनों में होने वाली कूटनीतिक गतिविधियों पर टिकी हुई हैं।












