भनवापुर क्षेत्र के कृषि विज्ञान केंद्र सोहना में शनिवार को एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन पर दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम संपन्न हुआ। यह कार्यक्रम जमीनी स्तर पर कार्यरत कृषि प्रसार कार्यकर्ताओं की क्षमता बढ़ाने के उद्देश्य से आयोजित किया गया था। प्रशिक्षण के दौरान, केंद्र के वरिष्ठ कृषि प्रसार वैज्ञानिक डॉ. शेष नारायण सिंह ने रासायनिक उर्वरकों के असंतुलित प्रयोग के दुष्परिणामों पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि इनके उपयोग से खेती की लागत बढ़ रही है और मिट्टी, जल तथा वायु प्रदूषण की समस्या गंभीर हो रही है। केंद्र के बीज वैज्ञानिक डॉ. सर्वजीत ने जैव उर्वरकों के प्रयोग के लाभ बताए। उनके अनुसार, जैव उर्वरकों के इस्तेमाल से उपज में वृद्धि होती है, उत्पादन लागत कम आती है और मिट्टी के स्वास्थ्य में भी सुधार होता है। मृदा वैज्ञानिक डॉ. प्रवेश कुमार देहाती ने किसानों को रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने के लिए एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन तकनीक अपनाने की सलाह दी। इसमें फसल अवशेषों को मिट्टी में मिलाना, हरी खाद का प्रयोग, फसल चक्र में दलहनी फसलों को शामिल करना और केंचुआ खाद, शहरी कंपोस्ट तथा तेल की खलियों जैसे जैविक खादों का उपयोग शामिल है। उन्होंने मृदा परीक्षण के आधार पर ही उर्वरकों का संतुलित मात्रा में प्रयोग करने पर जोर दिया। केंद्र के उद्यान वैज्ञानिक डॉ. प्रवीण कुमार मिश्रा ने फल एवं सब्जियों की अधिक और गुणवत्तायुक्त पैदावार के लिए भी एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन तकनीक अपनाने का सुझाव दिया। उन्होंने बताया कि इससे सब्जियों की उत्पादन लागत कम होगी और पैदावार में वृद्धि होगी। फसल अवशेषों का उपयोग फल एवं सब्जियों की खेती में आच्छादन (मल्चिंग) के रूप में भी किया जा सकता है। वैज्ञानिकों ने यह भी बताया कि फसलों के अवशेषों को पशुओं के चारे के रूप में प्रयोग करने और उनके गोबर व मूत्र को खेतों में डालने से रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता कम हो जाती है। इससे पैदावार में वृद्धि होती है और उत्पादन लागत भी घटती है। इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में रवेंद्र, रमाशंकर पटेल, शुभम वर्मा, सुजीत कुमार मौर्य, संतोष कुमार, रमाकांत प्रसाद, राजकुमार और दिनेश सहित कई प्रसार कार्यकर्ताओं ने प्रतिभाग किया।
रासायनिक उर्वरकों से बढ़ रही खेती की लागत:सोहना में कृषि वैज्ञानिकों ने बताया एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन का महत्व
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