नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया में बुधवार को एक महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान यह सवाल केंद्र में रहा कि क्या अदालत किसी धार्मिक प्रथा को “अंधविश्वास” घोषित कर सकती है। यह सुनवाई सबरीमाला मंदिर से जुड़े 2018 के ऐतिहासिक फैसले के बाद उठे व्यापक संवैधानिक प्रश्नों के संदर्भ में हो रही है।
नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ के सामने केंद्र सरकार की ओर से पेश तुषार मेहता ने दलील दी कि धर्मनिरपेक्ष अदालतें यह तय करने की विशेषज्ञता नहीं रखतीं कि कोई प्रथा अंधविश्वास है या नहीं। उन्होंने कहा कि न्यायाधीश कानून के जानकार होते हैं, धर्म के नहीं। उनके अनुसार, ऐसे मामलों में सुधार की जिम्मेदारी विधायिका की है, जिसे अनुच्छेद 25 के तहत कानून बनाने का अधिकार प्राप्त है।
हालांकि, पीठ के सदस्यों ने इस तर्क पर असहमति जताई। न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने कहा कि अदालत के पास यह अधिकार और क्षेत्राधिकार है कि वह यह निर्धारित कर सके कि कोई प्रथा अंधविश्वास की श्रेणी में आती है या नहीं। उन्होंने स्पष्ट किया कि इसके बाद आगे की कार्रवाई विधायिका के दायरे में आ सकती है, लेकिन अदालत अपने अधिकार से पीछे नहीं हट सकती।
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने भी अहम प्रश्न उठाया। उन्होंने पूछा कि यदि जादू-टोना जैसी प्रथाओं को धार्मिक परंपरा बताया जाए, तो क्या अदालत हस्तक्षेप नहीं करेगी, खासकर तब जब विधायिका मौन हो। इस पर केंद्र ने कहा कि अदालत “स्वास्थ्य, नैतिकता और सार्वजनिक व्यवस्था” के आधार पर न्यायिक समीक्षा कर सकती है, न कि केवल अंधविश्वास के आधार पर।
वहीं, न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने कहा कि किसी धार्मिक प्रथा की वैधता तय करते समय अदालत को उस धर्म की मूल दर्शनशास्त्र के आधार पर विचार करना चाहिए। उन्होंने कहा कि किसी अन्य धर्म के मानकों को लागू करना उचित नहीं होगा।
यह सुनवाई भारतीय संविधान में धार्मिक स्वतंत्रता और सामाजिक सुधार के बीच संतुलन को लेकर एक महत्वपूर्ण दिशा तय कर सकती है। मामले की अगली सुनवाई में इस बात पर और स्पष्टता आने की उम्मीद है कि न्यायपालिका धर्म से जुड़े विवादों में कितनी गहराई तक हस्तक्षेप कर सकती है।











