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बिहार ने दिखाई राह, अब यूपी की बारी,शिक्षा नहीं, वसूली मॉडल के आरोपों में घिरे निजी स्कूल

  • बिहार सरकार ने निजी स्कूलों पर सख्त नियम लागू किए, अब यूपी की परीक्षा

लखनऊ। नए शैक्षणिक सत्र के साथ एक बार फिर निजी स्कूलों की मनमानी देशभर में बहस का बड़ा मुद्दा बन गई है। कहीं फीस में भारी बढ़ोतरी, कहीं यूनिफॉर्म बदलने का दबाव और कहीं तय दुकानों से किताबें खरीदने की मजबूरी। मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए बच्चों की पढ़ाई अब सबसे बड़ा आर्थिक बोझ बनती जा रही है। ऐसे माहौल में बिहार सरकार ने जिस तरह निजी स्कूलों पर सख्ती दिखाई है, उसने उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों के सामने एक नया मॉडल रख दिया है। 

बिहार सरकार ने साफ कर दिया है कि निजी स्कूल अब फीस और दूसरे शुल्कों में मनमानी नहीं कर सकेंगे। हर स्कूल को सभी शुल्कों का पूरा ब्यौरा सार्वजनिक करना होगा। किसी भी अभिभावक को किसी खास दुकान से किताब, कॉपी, जूते या यूनिफॉर्म खरीदने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकेगा। री-एडमिशन और दूसरे अतिरिक्त शुल्कों पर भी सरकार ने सख्त रुख अपनाया है। सबसे राहत भरा फैसला यह माना जा रहा है कि फीस बकाया होने पर भी किसी छात्र को परीक्षा या कक्षा से बाहर नहीं किया जाएगा।

बिहार का यह कदम इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यह सिर्फ सरकारी आदेश नहीं, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति का प्रदर्शन भी है। मुख्यमंत्री स्तर से साफ संदेश दिया गया कि शिक्षा के नाम पर अभिभावकों का आर्थिक शोषण बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यही वजह है कि अब उत्तर प्रदेश में भी इस तरह की व्यापक नीति की मांग तेज होने लगी है। हालांकि यूपी सरकार ने भी नए सत्र में कई जिलों के जरिए निजी स्कूलों पर निगरानी बढ़ाई है। जिला शुल्क नियामक समितियों को सक्रिय किया गया है।

स्कूलों को फीस बढ़ोतरी का पूरा ब्यौरा सार्वजनिक करने के निर्देश दिए गए हैं। नोएडा, गाजियाबाद, बरेली और लखनऊ जैसे शहरों में मनमानी फीस को लेकर नोटिस भी जारी हुए हैं। प्रशासन ने यह भी कहा है कि स्कूल किसी तय दुकान से किताब और ड्रेस खरीदने का दबाव नहीं बना सकते। लेकिन जमीनी हकीकत अब भी अभिभावकों की चिंता कम नहीं कर पाई है। हर साल नए नामों से शुल्क जोड़ दिए जाते हैं।

स्मार्ट क्लास, एक्टिविटी फीस, एनुअल चार्ज और डेवलपमेंट फीस जैसे शब्द अभिभावकों की जेब पर अतिरिक्त बोझ डालते हैं। यूनिफॉर्म में हल्का बदलाव करके नई खरीदारी का दबाव बना दिया जाता है। छोटे शहरों तक में शिक्षा अब महंगी प्रतिस्पर्धा का बाजार बनती जा रही है।यही कारण है कि बिहार के फैसले को सिर्फ प्रशासनिक कदम नहीं, बल्कि सामाजिक राहत के रूप में देखा जा रहा है।

उत्तर प्रदेश में भी लाखों अभिभावक चाहते हैं कि सरकार एक स्पष्ट और कड़ा राज्यव्यापी कानून लागू करे, ताकि हर जिले में अलग-अलग व्यवस्था की जगह एक समान नियम लागू हों। बिहार ने फिलहाल एक मजबूत संदेश दिया है। अब निगाहें इस बात पर हैं कि देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में यह मुद्दा सिर्फ आदेशों तक सीमित रहता है या फिर सरकार इसे व्यापक जनहित के फैसले में बदलती है

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