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स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में युद्ध के बादल: अमेरिका ने की ईरान की नाकेबंदी, 15 से ज्यादा युद्धपोत तैनात

वॉशिंगटन। सामरिक रूप से महत्वपूर्ण फारस की खाड़ी में स्थित स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच तनाव अपने चरम पर पहुंच गया है। ईरान द्वारा इस समुद्री रास्ते पर नियंत्रण की कोशिशों के जवाब में अब अमेरिका ने भी वहां कड़ा पहरा लगा दिया है। ताजा रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका ने इस क्षेत्र में अपने 15 से ज्यादा शक्तिशाली युद्धपोत तैनात कर दिए हैं, जो ईरानी बंदरगाहों और तटीय इलाकों के आसपास पूर्ण नाकेबंदी लागू कर रहे हैं। इस सैन्य कार्रवाई के बाद खाड़ी क्षेत्र में युद्ध जैसे हालात पैदा हो गए हैं।
अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने पुष्टि की है कि यह नाकेबंदी बेहद सख्ती के साथ लागू की जा रही है। इस ऑपरेशन का मुख्य आकर्षण अमेरिका का अत्याधुनिक युद्धपोत यूएसएस ट्रिपोली है। इस जहाज को विशेष रूप से फाइटर जेट्स के संचालन के लिए डिजाइन किया गया है, जो एक समय में 20 से अधिक एफ-35बी लाइटनिंग 2 स्टील्थ फाइटर जेट ऑपरेट करने की क्षमता रखता है। इसके अलावा, एमवी-22 ओस्प्रे विमान और हेलिकॉप्टरों के जरिए भी होर्मुज जलमार्ग की निरंतर निगरानी की जा रही है। बयान के अनुसार, नाकेबंदी का उद्देश्य उन सभी जहाजों को रोकना है जो ईरान के बंदरगाहों में प्रवेश कर रहे हैं या वहां से बाहर जा रहे हैं। हालांकि, अमेरिका ने यह साफ किया है कि यह कार्रवाई केवल ईरान केंद्रित है। जो जहाज अन्य देशों के बंदरगाहों के लिए इस रास्ते का उपयोग कर रहे हैं, उन्हें सुरक्षित मार्ग दिया जाएगा। इसी बीच, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि ईरान का कोई भी फास्ट अटैकर जहाज नाकेबंदी के करीब आता है, तो उसे तुरंत नष्ट कर दिया जाएगा।

दरअसल, यह तनाव तब शुरू हुआ जब पिछले शनिवार को पाकिस्तान में अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच हुई शांति वार्ता बेनतीजा रही। 28 फरवरी को हुए सशर्त युद्ध-विराम को स्थायी समझौते में बदलने की कोशिशें नाकाम होने के बाद अमेरिका ने सैन्य दबाव बढ़ाने का फैसला किया। अमेरिका के इस एक्शन पर ईरान ने भी तीखी प्रतिक्रिया दी है। ईरानी सेना ने धमकी दी है कि यदि उनके बंदरगाहों को रोका गया, तो फारस और ओमान की खाड़ी का कोई भी बंदरगाह सुरक्षित नहीं रहेगा। ईरान का कहना है कि सुरक्षा या तो सबके लिए होगी या किसी के लिए भी नहीं। फिलहाल, अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या कूटनीति के जरिए इस सैन्य टकराव को टाला जा सकेगा या क्षेत्र एक बड़े संघर्ष की ओर बढ़ेगा।

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