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धान रोपाई से पहले खाद पर्याप्त होने का दावा:सिद्धार्थनगर में किसान बोले-सीजन आते ही बदल जाते हैं हालात


सिद्धार्थनगर जिले में कृषि विभाग ने उर्वरकों की पर्याप्त उपलब्धता का दावा किया है। हालांकि, हर वर्ष की तरह इस बार भी किसानों और प्रशासन की नजर अगले 10 से 15 दिनों पर टिकी हुई है, जब खाद की वास्तविक मांग सामने आएगी। वर्तमान में जिले में धान की नर्सरी तैयार करने और बीज डालने का कार्य चल रहा है। इस कारण अभी किसानों को बड़े स्तर पर उर्वरकों की आवश्यकता नहीं पड़ रही है। कृषि कार्य में तेजी आने और धान की रोपाई का समय नजदीक आने के साथ ही खाद की मांग में अचानक वृद्धि होगी। इसके बाद ही जिले में खाद वितरण व्यवस्था और प्रशासनिक दावों की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो पाएगी। जिले के इटवा, शोहरतगढ़, डुमरियागंज, बांसी, बढ़नी, खेसरहा, उसका बाजार और नेपाल सीमा से सटे कई क्षेत्रों में हर साल खाद सीजन के दौरान लंबी लाइनें लगना आम बात है। सहकारी समितियों और निजी दुकानों के बाहर सुबह से ही किसानों की भीड़ जुट जाती है। कई बार किसानों को घंटों लाइन में खड़े रहने के बाद भी पर्याप्त मात्रा में खाद नहीं मिल पाती, जिससे विभाग की ‘पर्याप्त उपलब्धता’ की घोषणाएं सवालों के घेरे में आ जाती हैं। इलाकों में तस्कर सक्रिय सीमावर्ती क्षेत्र होने के कारण जिले में खाद की तस्करी भी हर वर्ष एक बड़ा मुद्दा बनती रही है। मांग बढ़ते ही नेपाल सीमा से जुड़े इलाकों में तस्कर सक्रिय हो जाते हैं। पिछले वर्षों में कई ऐसे वीडियो और तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हुए हैं, जिनमें खाद की बोरियां सीमा पार नेपाल ले जाते लोग दिखाई दिए। स्थानीय लोगों का आरोप है कि प्रशासनिक सख्ती के दावों के बावजूद तस्कर निगरानी व्यवस्था को धता बताते हुए खाद को सीमा पार पहुंचाने में सफल हो जाते हैं। यही कारण है कि जब किसानों को खाद की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, उसी समय कई केंद्रों पर किल्लत की स्थिति बन जाती है। किसानों का कहना है कि हर वर्ष शुरुआती दिनों में प्रशासन पर्याप्त स्टॉक होने का दावा करता है, लेकिन जैसे-जैसे मांग बढ़ती है, वैसे-वैसे हालात बदलने लगते हैं। कई बार किसानों को एक-दो बोरी खाद के लिए पूरे दिन इंतजार करना पड़ता है। किसानों का आरोप रहता है कुछ स्थानों पर कालाबाजारी और गैर अनुदानित उत्पादों की जबरन टैगिंग की शिकायतें भी सामने आती रही हैं। किसानों का आरोप रहता है कि खाद लेने के लिए अनावश्यक उत्पाद खरीदने का दबाव बनाया जाता है, जिससे उनकी लागत और बढ़ जाती है। हालांकि जिला कृषि अधिकारी कार्यालय की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि जिले में यूरिया, डीएपी, एनपीके, एमओपी और एसएसपी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं तथा उर्वरकों की बिक्री पर किसी प्रकार का प्रतिबंध नहीं लगाया गया है। किसानों को उनकी आवश्यकता के अनुसार खतौनी, फार्मर रजिस्ट्री अथवा सहकारी समिति की सदस्यता पासबुक के आधार पर उर्वरक उपलब्ध कराने की बात कही गई है। विभाग ने सभी सहकारी समितियों और निजी उर्वरक विक्रेताओं को पीओएस मशीन के माध्यम से ही खाद वितरण करने के निर्देश दिए हैं। कानूनी कार्रवाई की चेतावनी साथ ही विभाग ने यह भी स्पष्ट किया है कि वितरण रजिस्टर में किसानों का पूरा विवरण दर्ज किया जाएगा और किसी भी दशा में निर्धारित मूल्य से अधिक कीमत पर खाद की बिक्री नहीं की जाएगी। गैर अनुदानित उत्पादों की टैगिंग करने या नियमों का उल्लंघन करने वाले विक्रेताओं के खिलाफ उर्वरक नियंत्रण आदेश 1985 के तहत कानूनी कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई है। सहायक आयुक्त एवं सहायक निबंधक सहकारिता प्रकाश बहादुर गौतम तथा जिला कृषि अधिकारी रविशंकर पाण्डेय की ओर से जारी इस बयान के बाद अब किसानों की नजर आने वाले दिनों पर टिकी है। क्योंकि जिले में वास्तविक स्थिति तब सामने आएगी जब धान की रोपाई शुरू होगी और खाद की मांग अचानक बढ़ जाएगी। पिछले वर्षों का अनुभव यही बताता है कि मांग बढ़ते ही लाइनें लंबी होने लगती हैं, तस्करी और कालाबाजारी की शिकायतें बढ़ने लगती हैं और प्रशासनिक दावों की परीक्षा शुरू हो जाती है

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