नई दिल्ली। ब्रिक्स सम्मेलन 2026 के दूसरे दिन भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने वैश्विक संस्थाओं में व्यापक सुधार की जरूरत पर जोर देते हुए कहा कि बदलती दुनिया में बहुपक्षवाद को प्रभावी बनाए रखने के लिए सुधार अब विकल्प नहीं बल्कि आवश्यकता बन चुका है। भारत मंडपम में आयोजित सत्र को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि मौजूदा वैश्विक संस्थाएं आज की चुनौतियों और वास्तविकताओं के अनुरूप खुद को ढालने में असफल रही हैं।
जयशंकर ने कहा कि आज की दुनिया पहले की तुलना में कहीं अधिक जुड़ी हुई, जटिल और बहुध्रुवीय हो चुकी है, लेकिन वैश्विक शासन व्यवस्था अब भी पुराने ढांचे पर आधारित है। इससे बहुपक्षीय संस्थाओं की विश्वसनीयता और प्रभावशीलता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि भरोसे की कमी और निर्णय लेने की कमजोरियों ने अंतरराष्ट्रीय ढांचे पर दबाव बढ़ाया है।
विदेश मंत्री ने कहा कि ब्रिक्स देशों की साझा जिम्मेदारी है कि वे अधिक प्रतिनिधित्वकारी, जवाबदेह और समावेशी वैश्विक शासन व्यवस्था को आगे बढ़ाएं। उन्होंने कहा कि भारत हमेशा ऐसे बहुपक्षवाद का समर्थक रहा है, जो वर्तमान वैश्विक वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करे और विकासशील देशों की आकांक्षाओं को महत्व दे।
अपने संबोधन में जयशंकर ने चार प्रमुख बिंदुओं पर जोर दिया। पहला, संयुक्त राष्ट्र और उसकी सहयोगी संस्थाओं में सुधार की आवश्यकता। उन्होंने कहा कि सुरक्षा परिषद आज भी पुराने दौर की संरचना को दशार्ती है और उसमें एशिया, अफ्रीका तथा लैटिन अमेरिका का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है। स्थायी और अस्थायी दोनों श्रेणियों में विस्तार जरूरी है।
दूसरे बिंदु में उन्होंने इंटर-गवर्नमेंटल नेगोशिएशन प्रक्रिया में हुई प्रगति का उल्लेख करते हुए कहा कि अब टेक्स्ट आधारित बातचीत की दिशा में आगे बढ़ने का समय आ गया है। तीसरे बिंदु में उन्होंने अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रणाली में सुधार की आवश्यकता बताई। उनके अनुसार सप्लाई चेन संकट, खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा की चुनौतियों तथा संसाधनों तक असमान पहुंच ने विकासशील देशों पर अतिरिक्त दबाव डाला है। बहुपक्षीय विकास बैंकों को अधिक संसाधन जुटाने और तेजी से प्रतिक्रिया देने योग्य बनाना होगा।
चौथे बिंदु में जयशंकर ने विश्व व्यापार संगठन आधारित निष्पक्ष और नियम आधारित वैश्विक व्यापार व्यवस्था को मजबूत करने पर बल दिया। उन्होंने कहा कि गैर-बाजार प्रथाओं और असंतुलित सप्लाई चेन ने वैश्विक अर्थव्यवस्था के सामने नए जोखिम खड़े किए हैं।
अंत में उन्होंने कहा कि मौजूदा समय का स्पष्ट संदेश सहयोग, संवाद और सुधार है तथा भारत एक अधिक लोकतांत्रिक और समान वैश्विक व्यवस्था के निर्माण के लिए सभी साझेदार देशों के साथ मिलकर काम करता रहेगा।












