सिद्धार्थनगर में मंगलवार शाम मुहर्रम का चांद दिखने के साथ ही इस्लामी नए वर्ष की शुरुआत हो गई है। इसी के साथ हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) और कर्बला के शहीदों की याद में ग़म का महीना भी आरंभ हो गया। चाँद की पुष्टि होते ही हल्लौर, जमौता, भटंगवा समेत विभिन्न गांवों और कस्बों में नौहा, मातम और मजलिसों का सिलसिला शुरू हो गया। मुहर्रम की पहली रात से ही इमामबाड़ों और अजाखानों में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ने लगी। जगह-जगह मजलिसों का आयोजन किया गया, जहाँ जाकिरों और उलमा ने कर्बला की घटनाओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) की कुर्बानी को इंसानियत, सत्य और न्याय की रक्षा का प्रतीक बताया। शोकाकुल माहौल में अकीदतमंदों ने नौहाख्वानी और सीना ज़नी कर कर्बला के शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की। हल्लौर स्थित जामा मस्जिद के पेश इमाम मौलाना शाहकार हुसैन जैदी ने अपने बयान में कहा कि मुहर्रम केवल शोक का महीना नहीं है। यह इंसानियत, सब्र, त्याग और अन्याय के खिलाफ खड़े होने का संदेश देता है। उन्होंने बताया कि कर्बला की जंग हमें सत्य और न्याय की रक्षा के लिए हर परिस्थिति में संघर्ष करना सिखाती है। हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) और उनके साथियों की कुर्बानी पूरी मानवता के लिए मार्गदर्शक है। मौलाना शाहकार हुसैन जैदी ने लोगों से मुहर्रम के दिनों में आपसी भाईचारा, शांति और धार्मिक मर्यादाओं का पालन करने की अपील की। उन्होंने यह भी कहा कि मुहर्रम की मजलिसों और मातमी कार्यक्रमों के माध्यम से नई पीढ़ी को कर्बला के संदेश से अवगत कराया जाना चाहिए। क्षेत्र में मुहर्रम की पहली तारीख से ही अकीदतमंदों के घरों और इमामबाड़ों में शोक का माहौल है। आगामी दिनों में मजलिसों, मातमी जुलूसों और अन्य धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा, जिसके लिए तैयारियां भी तेज कर दी गई हैं। मुहर्रम का यह पवित्र महीना कर्बला के शहीदों की याद और उनके आदर्शों को जन-जन तक पहुंचाने का माध्यम माना जाता है।
सिद्धार्थनगर में मुहर्रम का चांद दिखने पर मजलिस का आयोजन:पहली रात अजाखानों में अकीदतमंदों की दिखी भीड़, भाईचारे की अपील
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