उन्नाव। पशुपालन विभाग के एक पशु चिकित्सक की सेवा पुस्तिका में कथित रूप से जेल प्रवास का उल्लेख न होने के मामले में प्रकाशित खबर के बाद विभागीय गलियारों में हलचल तेज हो गई है। मामला सामने आने के बाद अब यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि सेवा अभिलेखों के सत्यापन, स्थानांतरण और पदस्थापना के दौरान संबंधित अधिकारियों ने किन तथ्यों के आधार पर कार्रवाई की थी।
सूत्रों के अनुसार, प्रकरण को लेकर विभागीय रिकॉर्ड खंगालने की तैयारी की जा रही है। चर्चा है कि यदि जांच शुरू होती है तो यह केवल संबंधित चिकित्सक तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि उन अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका भी सामने आ सकती है जिन्होंने वर्षों तक सेवा पुस्तिका का सत्यापन किया और अभिलेखों को प्रमाणित किया।
गौरतलब है कि पूर्व में प्रकाशित खबर में यह सवाल उठाया गया था कि व्यावसायिक परीक्षा मंडल (व्यापम) प्रकरण में गिरफ्तारी और जेल प्रवास की अवधि का उल्लेख सेवा पुस्तिका में दर्ज नहीं मिला। इसके बाद विभागीय कार्यप्रणाली और सत्यापन प्रक्रिया पर प्रश्नचिह्न लग गए हैं।
विभागीय सूत्रों का कहना है कि यदि अभिलेखों की गहन जांच कराई जाती है तो नियुक्ति, स्थानांतरण, पदोन्नति और सेवा सत्यापन से जुड़े कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आ सकते हैं। वहीं इस पूरे मामले को लेकर कर्मचारियों के बीच भी चर्चाओं का दौर जारी है।
डीएम के निर्देशों पर टिकी निगाहें
मामले को लेकर जिलाधिकारी घनश्याम मीना द्वारा जांच कराकर आवश्यक कार्रवाई किए जाने की बात सामने आने के बाद अब सभी की निगाहें प्रशासनिक कदमों पर टिकी हैं। लोगों का मानना है कि निष्पक्ष जांच से यह स्पष्ट हो सकेगा कि सेवा अभिलेखों में तथ्य दर्ज न होने के लिए कौन जिम्मेदार है और क्या विभागीय नियमों का पालन किया गया था।
इनसेट : कई सवाल अभी भी प्रतीक्षा रत
सेवा पुस्तिका का समय-समय पर सत्यापन किसने किया?
जेल प्रवास से जुड़े अभिलेख रिकॉर्ड में क्यों नहीं जोड़े गए?
स्थानांतरण और तैनाती के दौरान आपत्ति क्यों नहीं दर्ज हुई?
क्या विभागीय अधिकारियों ने उपलब्ध अभिलेखों का समुचित परीक्षण किया था?
जांच होने पर क्या अन्य जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका भी सामने आएगी?
इन सवालों के जवाब अब संभावित जांच रिपोर्ट से मिलने की उम्मीद की जा रही है।
प्रभाव और पहुंच की चर्चा
विभागीय चर्चाओं में यह भी कहा जा रहा है कि व्यापम घोटाले से जुड़े प्रकरण में नाम आने के बावजूद डॉ. पुष्पराज की विभाग में मजबूत पकड़ और प्रभाव बना है। सूत्रों के अनुसार उनकी पहुंच इतनी प्रभावशाली मानी जाती है कि उनके खिलाफ किसी भी प्रकार की कार्रवाई या जांच शुरू करने से पहले अधिकारी कई स्तरों पर विचार-विमर्श करते हैं। यही कारण है कि सेवा पुस्तिका में जेल प्रवास का उल्लेख न होने का मामला सामने आने के बाद भी विभागीय स्तर पर वर्षों तक कोई ठोस सवाल नहीं उठाया गया। हालांकि इन चर्चाओं और दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन विभागीय गलियारों में यह विषय लगातार चर्चा का केंद्र बना हुआ है।












