HomeHealth & Fitness...तो क्या नवीन भाजपा को पुराना पाठ पढ़ा गये नितिन बाबू !

…तो क्या नवीन भाजपा को पुराना पाठ पढ़ा गये नितिन बाबू !

  • यूपी में सरकार व संगठन के बीच चल रहे अर्न्तद्वंद्व को पाटने की कोशिश, सहयोगी दलों से भी मिले
  • राष्ट्रीय अध्यक्ष के नये चेहरे से अनजान थे तमाम, 18 किमी के रोड शो में बीच रास्ते कहीं दिखा खालीपन
  • न्यू बीजेपी के पोस्टर पर दिखे श्यामा प्रसाद मुखर्जी व पंडित दीन दयाल, नहीं दिखे अटल बिहारी बाजपेयी
  • पुराने कार्यकर्ताओं में चर्चा, 7 बार के सांसद प्रदेश अध्यक्ष और 5 बार के विधायक राष्ट्रीय अध्यक्ष नहीं पच रहा

लखनऊ। बड़े-बड़े जुलूसों से काम नहीं चलेगा, आगे 2027 का विधानसभा चुनाव है ऐसे में हम सबको जनता के बीच जाना होगा और कार्यकर्ताओं संग वाद-संवाद बनाये रखना होगा…ये पंक्तियां केंद्र से लेकर यूपी में सत्तासीन राजनीतिक  दल बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन के रहे, जब वो पार्टी संगठन में सबसे सर्वोच्च पद पर आसीन होने के बाद राजधानी लखनऊ के दो दिवसीय दौरे पर शनिवार को सुबह 11 पहुंचे, पूरे दिन कार्यक्रमों में हिस्सा लिया, रात्रि भोज व विश्राम किया और फिर दूसरे दिन यानी रविवार सुबह से अपने निर्धारित प्रोग्राम के तहत लोगों से मिलते चले गये। 

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इतना ही नहीं पहले दिन एयरपोर्ट से उनका काफिला आगे बढ़ते हुए पार्टी मुख्यालय पहुंचा और फिर वहां से सीधे शर्मा जी चाय की दुकान पर उन्होंने चाय पी, डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक के आवास पर आम का स्वाद चखा और लखनऊ उत्तर क्षेत्र के विधायक डा. नीरज बोरा के टीम के हाथों बनी झालमुड़ी खायी। इससे आगे दूसरे दिन वो पद्मश्री डा. विद्या बिंदु सिंह के आवास पहुंचे और वहां पर लोक कला, संस्कृति व साहित्य से जुडेÞ कुछ वरिष्ठ कलाकारों से भी भेंट की और उनकी बातें सुनीं। इसी क्रम में योगी सरकार में प्रतिभाग कर रहे एनडीए के सहयोगी दलों जैसे, निषाद पार्टी, सुभासपा और अपना दल एस के प्रमुख नेताओं से भी भेंट किया और उनके पक्ष को सुना।

पार्टी जानकार बताते हैं कि बीजेपी प्रमुख के उपरोक्त लाइनों व सिलसिलेवार इन कार्यक्रमों से यह स्पष्ट है कि राष्ट्रीय अध्यक्ष ने यह संदेश सरकार व संगठन के साथ-साथ पदाधिकारियों, मंत्रियों, सांसदों व विधायकों को दे दिया है कि अब हवाई बयानबाजियों से काम नहीं चलेगा बल्कि जमीनी स्तर पर सबको मिलजुलकर और तालमेल बनाकर काम करना होगा। साथ ही बीच में रह-रहकर सूबे में सरकार व संगठन के बीच चलने वाले खींचतान या फिर अंर्तद्वंद्व को कम करने के मद्देनजर हर प्रमुख कार्यक्रम में एक तरफ सरकार के मुखिया योगी और दूसरी ओर संगठन प्रमुख पंकज चौधरी को भी एक ही डोर से बांधे रखा।

वैसे भी मिशन 2027 के दृष्टिगत नितिन नबीन का प्रथम लखनऊ दौरा काफी अहम माना जा रहा। हालांकि पार्टी के अंदरखाने में यह भी चर्चा दबे जुबां रही कि बतौर राष्ट्रीय अध्यक्ष होने के नाते और लखनऊ जोकि लंबे समय से बीजेपी के सबसे कद्दावर राजनेताओं का गढ़ रहा है और अभी भी बना हुआ है…तो ऐसे में नितिन नबीन के स्वागत, अभिनंदन से जुड़े 18 किमी के रोड शो में आलमबाग सहित कुछ क्षेत्रों में क्यों खालीपन रहा, इन दो दिनों में क्यों ऐसा कोई जनसैलाब या फिर कार्यकर्ताओं का हुजूम क्यों नहीं उनका खुले दिल से स्वागत करते दिखा कि जिसको नियंत्रित करने को लेकर अक्सर स्थानीय पुलिस और प्रशासन के माथे पर बल पड़ जाता रहा, इक्का-दुक्का बार कुछ ऐसी वीडियो, क्लिप, रील या न्यूज आयी कहीं कहीं पर कुछ देरी के लिये सड़क जाम हो गया। 

आपसी खुसफुसाहट यह भी रही कि इस न्यू बीजेपी के अब तक के सबसे युवा अध्यक्ष के लखनऊ आगमन से जुड़े स्वागत पोस्टरों व बैनरों में श्यामा प्रसाद मुखर्जी और पंडित दीनदयाल तो दिखें, मगर लखनऊ वासी अपने हर दिल अज़ीज जनप्रतिनिधि (सांसद) रहे पंडित अटल बिहारी बाजपेयी के चित्र को ढूंढती रही। इन कार्यक्रमों के बीच एक बुजुर्ग पार्टी कार्यकर्ता ने बड़े ही रूंधे गले से कहा कि बेटा, अटल जी की कोई सानी नहीं, उन्हीं की खड़ाऊ लेकर पहले लालजी टंडन जीते और फिर उनके बनाये पग चिन्हों पर चलकर पहले गृहमंत्री और फिर रक्षामंत्री राजनाथ सिंह की राजनीति आगे बढ़ पायी, और आज इस नये बीजेपी के पोस्टर से वहीं गायब। 

कहीं कहीं तो कुछ बहुत पुराने पार्टी कार्यकर्ताओं व पदाधिकारियों के बीच यह भी चर्चा रही कि अभी सात बार के सांसद व केंद्र में मंत्री हमारे मौजूद प्रदेश अध्यक्ष हैं, तो वहीं बिहार में केवल 5 बार के विधायक और एक बार मंत्री रहे पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिये गये…ऐसे में संगठन के इन दोनों अहम पदों के बीच कहीं न कहीं आने वाले समय में ‘सिनियॉरिटी व जूनियारिटी’ का भाव टकरा सकता है। 

मगर कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि न्यू बीजेपी के नये अध्यक्ष भले ही ज्यादा अनुभवशील न हों, पर लखनऊ से जाते-जाते वो नितिन बाबू कहीं न कहीं प्रदेश भाजपा व सरकार को बीजेपी का पुराना पाठ पढ़ा गये कि उनकी ताकत बूथ और कार्यकर्ता ही हैं, इनसे कटे और अलग हुए तो परिणाम उल्टा होने में देर नहीं लगती। 

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