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मिस्र तक पहुंची जंग, क्या दूसरा होर्मुज बनेगा लाल सागर, दुनिया टेंशन में क्यों?

मध्य पूर्व में जंग का दायरा लगातार बढ़ रहा है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज संकट के बीच ईरान लाल सागर तक अपनी पहुंच बना रहा है। बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य पर हूती विद्रोहियों की समुद्री नाकेबंदी ने सऊदी अरब के अलावा पाकिस्तान समेत कई देशों की चिंता बढ़ा दी है। होर्मुज के बंद होने से कई देशों ने लाल सागर को विकल्प बनाया। इसी रास्ते से सऊदी अरब, अमेरिका और वेनेजुएला से तेल आयात शुरू किया।

अब लाल सागर तक पहुंची जंग की आहट ने दुनियाभर को चिंता में डाल दिया है। पहले यह जंग खाड़ी देशों और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज तक फैली थी। बुधवार की रात पहली बार मिस्र के एक बंदरगाह पर ड्रोन हमले ने जंग को और व्यापक बना दिया है।

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मिस्र तक पहुंची जंग की आग

इराक में ईरान समर्थित मिलिशिया पर अमेरिका और सऊदी अरब के संयुक्त हमलों के बाद मिस्र के दमियाता बंदरगाह पर प्राकृतिक गैस ले जा रहे दो जहाजों पर हमला किया गया।

ब्रिटेन की समुद्री सुरक्षा कंपनी ‘एम्ब्रे’ के मुताबिक इस हमले को ड्रोन से अंजाम दिया गया। इनमें से एक टैंकर अमेरिका का है और दूसरा ग्रीस से संबंधित है। मिस्र के प्रधानमंत्री कार्यालय ने भी ड्रोन हमलों की पुष्टि की।

तो इसलिए मिस्र बना निशाना!

मध्य पूर्व में मिस्र को अमेरिका का बेहद करीबी माना जाता है। हाल के दिनों में मिस्र ने सऊदी अरब के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाया। इसके अलावा सऊदी अरब और सोमालिया के साथ मिलकर एक सैन्य गठबंधन बनाने पर भी दिलचस्पी दिखाई। पिछले पांच महीने से अमेरिका और ईरान के बीच रुक-रुककर जारी जंग में मिस्र अछूता रहा है। लेकिन बुधवार को पहली बार उसके बंदरगाह को ड्रोन से निशाना बनाया गया है।

अभी तक यह साफ नहीं हो पाया कि हमला किसने किया है? लेकिन कुछ विश्लेषकों का मानना है कि ईरान अपने प्रॉक्सी की मदद से लाल सागर में भी स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसी स्थिति पैदा करने की फिराक में है।

ईरान ने सक्रिय किया प्रॉक्सी नेटवर्क

यमन के हूती विद्रोही भी ईरान के प्रॉक्सी है। 20 जून से हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के खिलाफ समुद्री नाकाबंदी लगा रखी है। सऊदी अरब के दो तेल टैंकरों पर हमला भी कर चुके हैं। इस बीच यमन की अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार का दावा है कि हूती विद्रोही बाब अल-मंदेब में ठीक उसी प्रकार टोल लगाने पर विचार करने में जुटे हैं, जैसा ईरान स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर लगाना चाहता है।

बता दें कि मध्य पूर्व में ईरान के प्रॉक्सी का नेटवर्क बेहद मिसाइल है। यमन में हूती, गाजा में हमास, लेबनान में हिजबुल्लाह और इराक में शिया मिलिशिया तेहरान के प्रॉक्सी है। इनके सहारे ईरान न केवल इजरायल, बल्कि सऊदी अरब को भी संतुलित करता है। माना जा रहा है कि पांच महीने की जंग के बाद तेहरान ने सऊदी अरब के खिलाफ यमन में हूती और इराक में अपने मिलिशिया को सक्रिय कर दिया है।

लाल सागर ने क्यों बढ़ाई सबकी टेंशन?

अगर हूती विद्रोही लाल सागर पर अपने हमलों को तेज करते हैं तो न केवल सऊदी अरब का तेल निर्यात प्रभावित होगा, बल्कि भारत, बांग्लादेश, श्रीलंका, मलेशिया, इंडोनेशिया, नेपाल और पाकिस्तान समेत एशिया के तमाम देशों को भी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है। कुछ देशों में ऊर्जा संकट गहराने का भी खतरा बढ़ सकता है। यूरोप के साथ होने वाले व्यापार में गिरावट देखने को मिल सकती है।

हूती के खिलाफ गठबंधन क्यों बना रहा सऊदी अरब?

लाल सागर में हूती विद्रोहियों की चुनौतियों से निपटने की खातिर सऊदी अरब एक नया गठबंधन बना रहा है। इसका मुख्यालय राजधानी रियाद में होगा। सऊदी अरब ने तमाम देशों को गठबंधन में शामिल होने का न्योता भेजा है। अभी तक कुवैत, मिस्र, जिबूती और सूडान ने इसमें शामिल होने की इच्छा जताई है। माना जा रहा है कि मिस्र के बंदरगाह पर हुआ हमला भी एक संदेश है, ताकि ईरान मिस्र को गठबंधन से दूर रख सके।

लाल सागर में घटा ट्रैफिक

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक साल 2023 से पहले बाब अल-मंदेब से रोजाना 70 से ज्यादा जहाज गुजरते थे। मगर हूती विद्रोहियों की धमकी के बाद जहाजों की संख्या घटकर 11 हो गई। विश्लेषकों का मानना है कि अगर होर्मुज के बाद लाल सागर में यातायात ठप हुआ तो ईंधन की कीमतें आसमान छू लेंगी।

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लाल सागर की गिनती दुनिया के सबसे अहम समुद्री मार्गों में होती है। अगर आप नक्शे पर नजर डालेंगे तो लाल सागर के एक छोर पर मिस्र, सूडान, इरिट्रिया, जिबूती और सोमालिया जैसे देश हैं। दूसरे छोर पर सऊदी अरब और यमन हैं। इस रास्ते से वैश्विक समुद्री यातायात का करीब 30 फीसद हिस्सा गुजरता है।

लाल सागर के एक छोर पर स्वेज नहर है। दूसरे छोर पर बाब अल-मंडेब है। बाब अल-मंडेब लाल सागर को हिंद महासागर से जोड़ता है। यह बेहद संकरा मार्ग है। जब ईरान ने होर्मुज बंद किया तो सऊदी अरब ने अपना कच्चा तेल पाइप लाइन से यानबू बंदरगाह तक पहुंचाया और लाल सागर के रास्ते निर्यात शुरू किया। मगर हूतियों की नाकेबंदी ने इसमें भी बाधा डाल दी।

लाल सागर पर भारत का कितना व्यापार टिका?

लाल सागर एशिया को यूरोप से जोड़ने का सबसे सस्ता और सुगम रास्ता है। अगर यहां कोई बाधा पैदा हुई तो इसका खामियाजा कई देशों को उठाना पड़ेगा। भारत का यूरोप को होने वाला लगभग 80 फीसद निर्यात लाल सागर पर ही निर्भर है। भारत के कुल निर्यात का 15 फीसद हिस्सा यूरोपीय यूनियन को जाता है। इससे आप लाल सागर के महत्व को समझ सकते हैं।

सप्लाई चेन होगी बाधित, महंगाई भी बढ़ेगी

लाल सागर और स्वेज नहर के रास्ते भारत से जाने वाले जहाज 10,000 नॉटिकल मील की दूरी 25.5 दिनों में पूरी करते हैं। अगर लाल सागर को बाईपास करके दक्षिण अफ्रीका के गुड होप के रास्ते नीदरलैंड तक पहुंचने में यह दूरी 13,500 नॉटिकल मील हो जाएगी। वहीं समय 34 दिनों का लगेगा। मतलब माल ढुलाई में देरी होगी और लागत भी बढ़ेगी।

अधिक समय लगने से सप्लाई चेन में बाधा और कंटेनर संकट भी खड़ा हो सकता है। इस बात की आशंका दुनिया की सबसे बड़ी तेल कंपनी अरामको ने भी जताई है। कंपनी का कहना है कि अगर हूती विद्रोही अपने हमले जारी रखते हैं तो जहाजों को लंबी यात्रा करनी पड़ेगी। आपूर्ति में देरी होगी और टैंकरों की कमी आ सकती है।

पाकिस्तान में गहरा सकता ईंधन संकट

पाकिस्तान अपनी जरूरत का करीब 80 से 85 फीसद तेल खाड़ी देशों से खरीदता है। अधिकांश आपूर्ति फारस की खाड़ी से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और बाद में अरब सागर के रास्ते कराची पोर्ट तक होती है। मगर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जंग के बीच पाकिस्तान ने सऊदी अरब के यानबू बंदरगाह से लाल सागर के रास्ते निर्यात करना शुरू किया। नतीजा यह हुआ कि लागत बढ़ी और आपूर्ति में 5 से 6 दिन की देरी हुई। मगर हूती विद्रोहियों की नाकेबंदी ने यह रास्ता भी बाधित कर दिया है। अब पाकिस्तान को अपनी आपूर्ति खतरे में पड़ने का डर सता रहा है।

कहां से कितना तेल खरीदता है पाकिस्तान

  • संयुक्त अरब अमीरात: 50 से 56 फीसद
  • सऊदी अरब: 30 से 35 प्रतिशत
  • कुवैत: करीब 4 फीसद

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