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तेल की जगह सोलर और पवन ऊर्जा से क्यों नहीं चल सकता देश; कहां पीछे छूट रहा भारत?

भारत में ऊर्जा का सबसे बड़ा साधन पानी या कोयले से बनने वाली बिजली है। अलग-अलग तरह के पावर प्लांट्स में बिजली बनाई जाती है और उसका इस्तेमाल होता है। कई जगहों पर इसी बिजली का इस्तेमाल तेल के विकल्प के रूप में भी किया जाता है। अब तेल को लेकर जारी संकट के बीच ऊर्जा के नवीकरणीय स्रोतों को लेकर फिर से खूब चर्चा हो रही है। भारत भी पिछले कुछ साल में सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा जैसे विकल्पों पर काम कर रहा है। इसके बावजूद इनसे बनने वाली बिजली को स्टोर कर पाने की क्षमता न होने के चलते इनका पूर्ण इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है।

अभी भी भारत में आधे से ज्यादा बिजली थर्मल प्लांट्स से ही बनती है। बीते कुछ सालों में सोलर और पवन ऊर्जा में इजाफा हुआ है लेकिन अभी भी यह कुल जरूरत के हिसाब से काफी नहीं है। जून 2025 तक के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में 240 गीगावाट की क्षमता थर्मल एनर्जी से थी, सोलर की 110.9 गीगावाट और पवन ऊर्जा की इंस्टॉल्ड कैपेसिटी 51.3 गीगावाट थी। 2014 से 2025 के बीच नवीकरण ऊर्जा के स्रोतों में जबरदस्त इजाफा भी हुआ है। 2014 में कुल क्षमता सिर्फ 76 गीगावाट की थी जो 2025 में 227 गीगावाट तक पहुंच गई थी।

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2014 से 2025 के बीच सोलर क्षमता 2.82 गीगावाट से बढ़कर 110.9 गीगावाट पहुंच गई है। इसी तरह पवन ऊर्जा की क्षमता 21 गीगावाट से बढ़कर 51.3 गीगावाट तक पहुंच गई है। हालांकि, सबसे बड़ी समस्या यह है कि नवीकरणीय ऊर्जा के स्रोतों से बनने वाली ज्यादातर बिजली को स्टोर करने की पर्याप्त क्षमता नहीं है। यही कारण है कि ये स्रोत ज्यादा क्षमता के बावजूद उतने प्रभावी नहीं हो पा रहे हैं।

कहां पिछड़ रहा है भारत?

सौर ऊर्जा सतत नहीं है। इसका मतलब है कि धूप होगी तो बिजली बनेगी और रात होते ही बिजली का उत्पादन बंद। इसी तरह पवन ऊर्जा का भी है। हवा चलेगी तभी बिजली बनेगी। हवा की रफ्तार कम होने से बिजली का उत्पादन प्रभावित होगा। इसकी तुलना में थर्मल या हाइड्रो प्लांट्स में 24 घंटे बिजली का उत्पादन होता है और वहां से लगातार सप्लाई दी जा सकती है।

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रोचक बात है कि पिछले कुछ साल में जबरदस्त बढ़ोतरी के चलते कुल इंस्टॉल्ड क्षमता में अब इन नवीकरणीय स्रोतों की हिस्सेदारी 53 प्रतिशत तक पहुंच गई है। कुल 532 गीगावाट क्षमता में 283 गीगावाट इन्हीं स्रोतों से बनती है लेकिन इसमें सौर ऊर्जा की हिस्सेदारी 150 गीगावाट है।

बिजली स्टोर नहीं कर पाता है भारत

इन संसाधनों के साथ एक समस्या यह है कि अगर बिजली ज्यादा भी बने तो उसे स्टोर नहीं किया जा सकता। उदाहरण के लिए अगर हवा तेज चले या धूप ज्यादा हो तो बिजली ज्यादा बनेगी लेकिन उसे रखा नहीं जा सकता। कुछ देशों में बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम्स (BESS) का इस्तेमाल किया जाता है जिसके चलते बिजली को स्टोर किया जा सकता है और जरूरत पड़ने पर इस्तेमाल किया जा सकता है। इसी तरह पम्प्ड हाइड्रो स्टोरेज (PHS) का भी इस्तेमाल होता है जिसमें पानी को एक निचले जलाशय से ऊपरी जलाशय में भेजा जाता है और जरूरत पड़ने पर ज्यादा बिजली का उत्पादन किया जा सकता है।

वहीं, BESS में बैटरियों का इस्तेमाल होता है और लीथियम आयरन फॉस्फेट (LFP) बैटरियों का इस्तेमाल होता है। इनकी मदद से जब धूप ज्यादा हो तब ज्यादा बिजली बनाकर उसे स्टोर किया जा सकता है। दुनिया में जितनी भी बिजली स्टोर होती है उसमें 90 प्रतिशत हिस्सेदारी LFP की ही होती है लेकिन इस मामले में भारत की स्थिति कमजोर है।

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भारत में बिजली स्टोर करने वाली BESS क्षमता सिर्फ 0.27 गीगावाट है। वहीं, PHS क्षमता सिर्फ 7.2 गीगावाट है। बिजली उत्पादन की तुलना में यह 2 प्रतिशत के भी बराबर नहीं है। अब सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी की योजना है कि इसे 2035-36 तक बढ़ाकर लगभग 174 गीगावा तक पहुंचाया जाए। इसमें BESS की क्षमता 80 और PHS की क्षमता 94 गीगावाट तक बढ़ाने का लक्ष्य है।

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