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 ऐतिहासिक भोजशाला को एएसआई की रिपोर्ट से मिली वाग्देवी मंदिर के रूप में मान्यता

भोपाल। मध्य प्रदेश के धार जिला मुख्यालय स्थित ऐतिहासिक भोजशाला मामले में शुक्रवार को उच्च न्यायालय ने बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की सर्वे रिपोर्ट के आधार पर इसे मां वाग्देवी का मंदिर माना है।

दरअसल, एएसआई ने कोर्ट में 2100 पन्नों की विस्तृत रिपोर्ट पेश की थी। इस रिपोर्ट को एएसआई के 98 दिनों तक चले सर्वे के बाद तैयार किया था, जिसमें कई अहम तथ्य सामने आए।

रिपोर्ट के अनुसार खुदाई के दौरान मूर्तियां, सिक्के और कई ऐतिहासिक अवशेष मिले हैं। इसमें कहा गया कि परमारकालीन भवन की नींव के पत्थरों पर बाद में निर्माण किया गया, जबकि सर्वे में मिले स्तंभों और वास्तुकला से संकेत मिलता है कि ये पहले मंदिर का हिस्सा रहे होंगे, जिन्हें बाद में मस्जिद निर्माण में उपयोग किया गया।

रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि परिसर में चारों दिशाओं में 106 खड़े और 82 आड़े स्तंभ मिले, यानी कुल 188 स्तंभ पाए गए। इन स्तंभों की बनावट से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि वे मूल रूप से मंदिर स्थापत्य का हिस्सा थे। साथ ही रिपोर्ट में कहा गया कि स्तंभों पर बनी देवी-देवताओं और मानव आकृतियों को बाद में औजारों से क्षतिग्रस्त किया गया था।

दीवारों पर मिलीं देवी-देवताओं की आकृतियां
सर्वे के दौरान टीम को भोजशाला की दीवारों पर देवी-देवताओं की आकृतियां मिलीं। रिपोर्ट में उन मूर्तियों को भी शामिल किया गया है, जिन्हें पहले परिसर से निकालकर मांडू संग्रहालय में सुरक्षित रखा गया था।

बताया गया कि ये मूर्तियां भी भोजशाला परिसर से ही मिली थीं और संरक्षण के उद्देश्य से संग्रहालय में रखी गई थीं। खुदाई में मिली कलाकृतियां संगमरमर, नरम पत्थर, बलुआ पत्थर और चूना पत्थर से तैयार की गई थीं। इनमें गणेश, नृसिंह, भैरव, देवी-देवताओं और पशुओं की आकृतियों के चिन्ह मिले हैं।

सर्वे में दो ऐसे स्तंभ भी मिले हैं, जिन पर “ॐ सरस्वत्यै नमः” लिखा हुआ है। सर्वे रिपोर्ट के पेज नंबर 148 में उल्लेख किया गया है कि भोजशाला में मौजूद स्तंभों की वास्तुकला यह दर्शाती है कि वे पहले मंदिर का हिस्सा थे और मस्जिद निर्माण के दौरान बेसाल्ट के ऊंचे चबूतरों पर उनका दोबारा उपयोग किया गया।

रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि एक स्तंभ पर देवी-देवता की आकृति मौजूद है। पूर्वी हिस्से में स्तंभों की कतार में लगे एक बड़े शिलालेख में प्राकृत भाषा की दो कविताएं अंकित हैं, जिनमें प्रत्येक में 109 छंद हैं।

पश्चिम में स्थित मेहराब की दीवारें बेसाल्ट से बने चबूतरे से सटी हुई हैं, जिनके नीचे नक्काशी दिखाई देती है। रिपोर्ट के अनुसार चबूतरे और मेहराब की दीवारों की निर्माण शैली अलग-अलग है।

रिपोर्ट में बताया गया कि अंग्रेज शासनकाल में भी भोजशाला का सर्वे हुआ था। इसके अलावा वर्ष 1987 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा किए गए उत्खनन में भोजशाला से हिंदू धर्म से जुड़ी 32 मूर्तियां मिली थीं।

रिपोर्ट में निष्कर्ष निकाला गया है कि वर्तमान संरचना यानी कमाल मौला दरगाह के निर्माण में पहले से मौजूद मंदिर के हिस्सों का उपयोग किया गया था।

परमारकालीन मंदिर होने के मिले संकेत
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा किए गए सर्वे में भोजशाला के मंदिर होने के कई प्रमाण मिलने का दावा किया गया है। रिपोर्ट में कहा गया कि वर्तमान संरचना यानी कमाल मौला दरगाह के निर्माण में पहले से मौजूद मंदिर के हिस्सों का उपयोग किया गया था और ये हिस्से परमारकालीन काल के थे।

रिपोर्ट में कहा गया है कि भोजशाला से मिली कलाकृतियां बेसाल्ट, संगमरमर, नरम पत्थर, बलुआ पत्थर और चूना पत्थर से बनी थीं, जो इसकी समृद्ध कलात्मक विरासत को दर्शाती हैं।

रिपोर्ट में सामने आए महत्वपूर्ण तथ्य
रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि भोजशाला मंदिर सह कमाल मौला मस्जिद परिसर में संस्कृत, प्राकृत और स्थानीय बोलियों में नागरी लिपि के अभिलेख मिले हैं, जिन्हें 12वीं से 16वीं शताब्दी ईस्वी के बीच का माना जाता है।

रिपोर्ट में पारिजातमंजरी-नाटिका, अवनिकूर्मशतम और नागबंध अभिलेख जैसे महत्वपूर्ण शिलालेखों का भी उल्लेख किया गया है।

रिपोर्ट के अनुसार एक विशाल अभिलेख, जिसमें पारिजातमंजरी-नाटिका और विजयश्री अंकित है, उसमें बताया गया है कि यह कृति मदन द्वारा रचित थी।

मदन, धार के राजा अर्जुनवर्मन के गुरु थे। अर्जुनवर्मन, सुभटवर्मन के पुत्र और परमार वंश से संबंधित थे, जिन्हें सम्राट भोजदेव का वंशज माना जाता है।

प्रस्तावना के अनुसार इस नाटक का प्रथम मंचन देवी सरस्वती (शारदा देवी) के मंदिर में हुआ था। एक अन्य बड़े अभिलेख में प्राकृत भाषा की दो कविताएं अंकित हैं, जिनमें प्रत्येक में 109 श्लोक हैं।

पहली कविता के उपसंहार में उसका नाम “अवनिकूर्मशतम” बताया गया है और उसकी रचना महाराजाधिराज परमेश्वर भोजदेव को समर्पित मानी गई है।

दूसरी कविता के अंत में कोई उपसंहार नहीं है, लेकिन रिपोर्ट में कहा गया है कि उसके रचनाकार भी भोज ही थे। पश्चिमी स्तंभ-श्रेणी में स्थित दो अलग-अलग स्तंभों के अभिलेख व्याकरण और शिक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बताए गए हैं।

रिपोर्ट के अनुसार ये अभिलेख उस विद्या-केंद्र की परंपरा की ओर संकेत करते हैं, जिसे परंपरागत रूप से राजा भोज द्वारा स्थापित माना जाता है। इनमें से एक अभिलेख के प्रारंभिक श्लोक में परमार वंश के उदयादित्य के पुत्र राजा नरवर्मन (शासनकाल 1094–1133 ई.) का उल्लेख मिलता है।

 

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