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भारतीय ज्ञान परम्परा वैश्विक कल्याण का आधार:डॉ. अमित उपाध्याय ने महन्त अवेद्यनाथ स्मृति व्याख्यानमाला में कहा


गोरखपुर के गोरक्षपीठाधीश्वर महन्त अवेद्यनाथ स्नातकोत्तर महाविद्यालय, चौक बाजार में ब्रह्मलीन महन्त अवेद्यनाथ स्मृति व्याख्यानमाला का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का मुख्य विषय ‘भारतीय ज्ञान परम्परा में कुटुम्ब प्रबन्धन: पारम्परिक ज्ञान से आधुनिक दृष्टिकोण तक’ रहा। मुख्य अतिथि दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अमित उपाध्याय ने कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा (IKS) का मूल मंत्र पूरे संसार को एक परिवार मानना है, जो वैश्विक कल्याण का आधार है। डॉ. उपाध्याय ने अपने संबोधन में बताया कि कौटिल्य का अर्थशास्त्र हो या विदुर नीति, भारतीय दर्शन केवल व्यक्तिगत विकास तक सीमित नहीं है। यह सम्पूर्ण समाज और राज्य के कुशल प्रबन्धन का व्यापक दृष्टिकोण प्रदान करता है। उन्होंने चरक, सुश्रुत और धन्वन्तरि के योगदान पर प्रकाश डालते हुए कहा कि प्राचीन भारतीय चिकित्सा और विज्ञान ने ही आधुनिक विश्व को नई दिशा दिखाई है। उन्होंने पश्चिमी सभ्यता से तुलना करते हुए कहा कि जहाँ पश्चिमी सभ्यता मुख्य रूप से भौतिक विकास को प्राथमिकता देती है, वहीं भारतीय ज्ञान परम्परा नैतिक मूल्यों और संस्कारों पर आधारित जीवन जीने की शिक्षा देती है। उन्होंने जोर दिया कि आज पूरी दुनिया इस प्राचीन भारतीय ज्ञान की समृद्धि और वैभवशाली परंपरा को मान चुकी है। डॉ. उपाध्याय ने युवाओं से अपनी इस विरासत को समझकर आचरण, विचार, मूल्यों और व्यवहार में भारतीय ज्ञान परम्परा को शामिल करने का आह्वान किया, जिससे ‘विकसित भारत’ की संकल्पना साकार हो सकेगी। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे महाविद्यालय प्रभारी डॉ. शैलेंद्र प्रताप सिंह, जो दिग्विजय नाथ पीजी कॉलेज, गोरखपुर के पूर्व प्राचार्य भी हैं, ने कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा का मूल आधार कुटुम्ब यानी परिवार ही है। उन्होंने ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की अवधारणा का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि भारतीय संस्कृति पूरे संसार को अपना परिवार मानकर चलती है। डॉ. सिंह ने आधुनिकता के इस दौर में भी नैतिक मूल्यों और अनुशासन के साथ जीवन जीने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने सभी से किसी भी प्रकार के विभेद को भूलकर एक भारतीय के रूप में सशक्त एवं एकत्व की भावना के साथ ‘विकसित भारत’ के संकल्प को पूरा करने हेतु तैयार रहने का आग्रह किया। कार्यक्रम के अंत में संस्कृत कार्यशाला में प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले 51 विद्यार्थियों को प्रमाण-पत्र वितरित किए गए। उनके सराहनीय प्रयासों की प्रशंसा भी की गई।

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