विशेष संवाददाता संत कुमार गोस्वामी अंतराष्ट्रीय माडल एवम एक्ट्रेस आर्ज़मन मुग़ल से एक्सक्लूसिव संवाद

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1 आप ने अपनी फिल्मी करियर की शुरुवात कैसे की

मैं ने अपने बचपन मेंअपने चाचा जी के घर टीवी में अपने गांव लाम्बेरी,भारत में जो पहली फिल्म देखी, वह मुगल-ए-आजम थी और मैं मधुबालाजी की परफ़ॉर्मेंस को देखकर रोमांचित हो गई। मैं फिल्म के उस किरदार को अपने अंदर जीने लगी थी, मेरे पिता भारतीय सेना में थे जब हम उनके साथ दिल्ली आये। मैं 9th में थी, मुझे एक ज्वैलर शूट का ऑफर आया, मुझे वो लोग अच्छे लगे इसलिए मैंने शूट कर ली, फिर मुझे मुंबई से एड्स के प्रस्ताव आने लगे, मेरी पढ़ाई कम्पलीट करने के लिये मैं ने मुंबई मैं एडमिशन ली, मैं एक बार जो यहाँ आयी तो फिर वापिस ना जा सकी कला की दुनिया। मैं सीखने मैं इतनी मशग़ूल हो गई की अब तक सीख रही हूँ, मैंने 15 साल की उम्र में मुंबई में आभूषण के विज्ञापन के साथ शुरुआत की, 2003 में मेरा पूरे परिवार के साथ मुंबई में स्थानांतरित हो गए। ज्वैलरी के उस विज्ञापन ने लोगों का ध्यान मेरी तरफ़ बहुत आकर्षित किया, मैं जहां भी जाती थी लोग मेरी बातें सुनना पसंद करते थे और ऐसा व्यवहार करते थे जैसे वे मुझसे जीवन के लिए कुछ सीखना चाहते हों, में अपनी उम्र से हमेशा बड़ी बातें करती हूँ। सब मुझसे मिलके ताज्जुब् में रहते थे, मेरी एक एक बात पे लोग तालियां बजाते थे और हर बात में कुछ नया महसूस करते थे, सब भिलाकर मुझमें खोने लगते थे।
जिससे मेरे अंदर एक अजीब सी बात सत्यापन हुई मैं हमेशा लोगों को खुश देखना चाहती थी जिसके लिए मैं ने आसान और मुश्किल लफ़्ज़ों के अर्थ समझने छोड़ दिए। मैं ने स्क्रीन पे ही नहीं बल्कि रियल लाइफ मैं भी लीड करना शुरू कर दी , स्कूल हो या दोस्त हों या फ़ैमिली हो।सब मेरी बातें मानने लगे और सही साबित भी होने लगी, जब मेरे पास विज्ञापन का काम ज़्यादा हो जाता तो मैं अपनी जगह दूसरी मॉडल्स को भी एडजस्ट करवा देती थी, वहीं आदतें मेरे अंदर आ गई ,2006 में, मेरे अंदर एक अजीब सी लहर मेरे पैरों से गुज़री और सीधे मेरे मस्तिष्क तक पहुँच गई और मेरी आत्मा अभिनय में कूदने से पहले एक मिलीसेकंड का इंतज़ार नहीं कर पाई। आह, क्या अहसास था! फिर मैं ने acting course किया उसके बाद 2009 मैं मेरी पहली तमिल फ़िल्म पालीनिएप्पा कल्लूरी आइ, मैंने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विज्ञापनों और प्रिंटों सहित (2,151) विज्ञापन किए।मैं उन सभी लोगों को धन्यवाद करती हूँ, जिन्हों ने मुझे यहाँ तक का सफर तय की , लोगों की मदद के बिना यह ना मुमकिन था। अच्छी रूहों के मालिक सच में मददगार होते हैं, मैंने बहुत मुल्क़ों की यात्रा की, दुनिया देखी और अलग-अलग लोगों को समझी। मैने पाया की मैं हर जगह सिर्फ़ सीख रही थी

 

2. आप के बारे में दर्शक जानना चाहते है की इस क्षेत्र में एक सफल एक्ट्रेस बनने के लिए कैसा संघर्ष रहा ?

फ़िल्म क्षेत्र हो या कोई भी क्षेत्र हो, संघर्ष हर जगह करना पड़ता है, काम करने से होता है और करना बहुत मुश्किल होता है, मैं ने संघर्ष बहुत की मगर उसे कभी महसूस नहीं किया जोश और जुनून ऐसा था की में आँधी बहरी और गूँगी हो गई थी, अगर कुछ दिखाई देता था तो सिर्फ़ मेरा काम, जब मुझे पहली बार 2006 मैं फ़िल्म की मीटिंग के लिए बुलाया गया मैं जिनसे मिली उनको देखतेही मेरे होश उड़ गये वो देव आनन्द साहब थे। हमने घण्टों बैठ कर बातें की उन्होंने मुझे कहानी सुनाई, मुझे कहानी अच्छी भी लगी मगर एक सीन बिकिनी पहनकर पानी से बाहर आने का था वो जिस अन्दाज़ मैं उन्हीं ने बताया की दिल खोल के आजा मैं तुझे एक दुम सेक्सी और हॉट दिखाऊँगा लोग बस देखते रहेंगे। और मैं डर गई मैं ने फ़िल्म ना करने का फ़ैसला किया। मैं वहाँ से आ गई जब ऑफिस से फ़ोन आया तो मैं ने रीज़न बिना बताए माना कर दिया, बिना जाने की उन्होंने बहुत सारे आर्टिस्ट्स को इंट्रोड्यूस किया था। वो मेरी गलती थी। मुझे आज समझ आता है कि मुझे वो फ़िल्म कर लेनी चाहिए थी। मुझे उनकी फ़िल्म माना करने का बहुत अफ़सोस है


फिर 2008 मैं मुझे तमिल फ़िल्म की मीटिंग के लिए चेन्नई से आए हुए एक प्रोडूसर ने बुलाया तो जहां मुझे जाना था वहाँ जाने के बजाए मैं कहीं और पहुंच गई वहाँ भी तमिल फ़िल्म बन रही थी, और वो चेन्नई के एक अच्छे बैनर अंबाल्य फिल्म्स के ambhalaya प्रभाकरण सिर थे जिन्हों ने मुझे अगले दिन राजश्री प्रोडक्शन में बुलाया और वहाँ पे PL Gupta साहब ने मेरी रेस्पोंसिबिलिटी ली और मुझे साइन करवाया, फिर मैं चेन्नई गई वहाँ हमने 40 दिन की शूटिंग की। मेरा काम ख़त्म होने के बाद में वापिस मुंबई आ गई।
कुछ वक़्त बाद फिर मुझे बॉलीवुड राइटर इक़रामअख़्तर साहब ने हिन्दी फ़िल्म या रब के लिये बुलाया मेरा ऑडिशन लिया फिर डायरेक्टर hasnain sir ने कहानी सुनाई बहुत ही अमेजिंग तरीक़े से। उसके बाद इक़राम साहब ने एग्रीमेंट साइन करवाया फिर मुझे शूट पे लखनऊ बुलाया गया मैं ने दिल ओ जान से मेहनत की मैं बेहद खुश थी की मेरी पहली फ़िल्म आ रही है, मैं ने फ़िल्म इंडस्ट्री के काफ़ी डायरेक्टर्स और प्रोडूसर को बोल दिया था मेरी फ़िल्म आ रही है सबको देखनी होगी। वो सभी मेरी पहचान के बॉलीवुड के लोग इंतज़ार करने लगे की आर्ज़मन मुग़ल की फ़िल्म आ रही है, होर्डिंग देखा तो पता चला की , मैं पोस्टर मैं हूँ ही नहीं और ट्रेलर मैं भी बस एक झलक , सुभाष गई साहब ने कहा क्या अजीब फ़ीका पोस्टर है लड़की के बिना। तब काफ़ी सारे makers मुझे अफ़सोस ज़ाहिर करने लगे, विपुल शाह सर को मैं ने ट्रेलर दिखाया
जिसमें मेरा सिर्फ़ एक शॉट देख के उन्हूँ ने कहा क्यों आप जैसी सुन्दर लड़कियाँ ऐसी फिल्म्स कर लेती हैं, सतीश कौशिक साहब ने कहा कोई बात नहीं, तुम इस फ़िल्म से ज़्यादा उम्मीद मत रखना और बहुत अच्छा काम आएगा। यू हैव ब्राइट फ्यूचर। और फिर अनुपम खेर साहब तो एवर्ग्रीन हैं वो किसी हार को हार मानते ही नहीं वो कहते हैं ( कुछ भी हो सकता है ) उसके बाद दोबारा मैंने किसी को नहीं कहा की मेरी फ़िल्म आ रही है हाहाहा….. फिर मैं ने अपने आपको समझाया कोई बात नहीं यह शुरुआत हैं मंज़िले और सही. कोई कितना भी ग़लत बोले मगर मैं हमेशा सिर्फ़ अच्छा करूँगी. चाहे मैं अब एक अच्छी अदाकारा बनूँ या ना बनु। मगर एक अच्छी इंसान बनूँगी।
एक कामयाब अभिनेत्री बनना सिर्फ़ अकेले मेरे हाथ मैं नहीं इसलिए जो तक़दीर मैं लिखा है वो मुझे मंज़ूर है मगर मैं हार नहीं मानूगी, और सीखती रही आज भी मैं सीख रही हूँ और सीखती रहूँगी या रब रिलीज़ हुई दुनियाँ भर मैं लोगों ने देखी, उस फ़िल्म का सबसे ज़्यादा फ़ायदा मुझे ही हुआ पूरी दुनियाँ मैं बहुत लोग मुझे जानने लगे।
तब सावन कुमार टक साहब का मुझे कॉल आया ऑफिस आजा कुछ काम है तुझसे। मैं भाग भाग के ऑफिस गई office के बाहर मैं ने पोस्टर देखा 2 hero 1 heroine मगर हेरोइन ने सिर्फ़ bikini पहनी थी मैं वहीं से घबरा गई। उन्हों ने मुझे कहानी सुनाई मुझे कहानी बहुत अच्छी लगी मगर मेरे दिमाग़ से bikini का ख़ौफ़ नहीं जा रहा था मैं ने सोचा देव साहब की फ़िल्म छोड़ने का अफ़सोस मुझे ज़िंदगी भर रहेगा कहीं ऐसा ना हो यह फ़िल्म छोड़ने का एहसास मेरे अंदर फिर घर कर दे। मैं ने डरते डरते बोल दिया सावन जी वो जो पोस्टर..। उन्होंने मेरे बोलने से पहले ही बोल दिया वो तो पहनना पड़ेगा मैं ने फिरसे पूछा क्या हम bikini की जगह shorts नहीं पहन सकते? उन्हों ने सोचा और कुछ बोले नहीं फिर मैं आगई वो ख़ुद मुझे नीचे छोड़ने आये। मुझे उनका यह जेस्चर बहुत अच्छा लगा। मैं अगले दिन तक सिर्फ़ यही सोचती रही की अब क्या होगा। अगले दिन सावन जी का फ़ोन आया ऑफिस आजाओ । हीरो को पसंद करो- hahaha मैं हीरो को पसंद करने गई हाहाहा Jas Binag और Rajesh joshi मैं ने देखा और मैं ने कहा सावन जी अगर आपके हिसाब से फ़िल्म के करैक्टर मैं फिट है तो मुझे किसी भी हीरो से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता आप जिसे चाहें उसे हीरो ले लें। फिर हम Mauritius गये 45 डेज़ शूट करके वापिस आए । फ़िल्म का कुछ काम अभी बाक़ी था। मगरकिसी वजह से बंद हो गई।मुझे बेहद अफ़सोस हुआ इस फ़िल्म का बंद होना मेरे लिए ऐसा था जैसे किसी का breakup होने पे दिल टूटता है यह मेरे लिये बहुत गहरा सदमा था। जिसे शायद मैं अब तक भूल नहीं सकी।

फिर मुझे एक और फ़िल्म मिली tera kya hoga lambodar वो काफ़ी शूट होने के बाद बंद हो गई फिर synide फिर Dastan फिर sad flute सब बंद होती रही। सभी फ़िल्मों मैं एक ही common इशू था finances। फिर मैं विज्ञापन में करती रही। और 6 साल तक मैं ऑडिशंस देती रही और मीटिंग करती रही मगर कभी रोल पसंद नहीं आता था तो कभी मैं रोल को पसंद नहीं आती थी तब मैं ने सोचा की अब कोई फ़िल्म नहीं मिलेगी मैं बिलकुल उम्मीद छोड़ चुकी थी और अपने आपसे कहा की अब तुम कोई फ़िल्म नहीं करोगी बस ।

मगर फिर मुझे एक फ़िल्म का ऑफर आया, अमूल्य दास सिर का जिन्हें ने ऑफर की “ओ पुष्पा आई हेट टियर्स “ जिसमें मेरे साथ कृष्णा , अभिषेक और जयराम कार्थिक थे इस फ़िल्म की शूटिंग के दौरान ही मुझे एक और कॉल आया मीटिंग के लिए सतीश कौशिक जी के मैनेजर अमरजीत सिंह जी का , पहले उनहोंने मुझे जिस रोल के लिए बुलाया था, वो रोल मुझे पसंद नहीं आ रहा था। मैं ने उस फ़िल्म को करने से माना कर दिया,
फिर प्रोडूसर संजय सुंटकर सर ने एक बार कहानी सुनने के लिए कहा । मैं ने जब कहानी सुनी तो मुझे वो रोल पसंद आया जो उन्होंने सोचा नहीं था कि मैं करूँगी, रोल ऐसा था की ( एक अमीर बाप की बेटी को एक गरीब लड़के से प्यार हो जाता है वो अपने पापा से बग़ावत करके शादी कर लेती है फिर उनकी एक बेटी होती है, ग़रीबी होने की वजह से और पैसा कमाने की दौड़ मैं हसबैंड से टाइम ना मिल पाने की वजह से वो घर छोड़ के वापिस चली जाती है, जहां उसके पापा उससे कई सालों से नाराज़ थे फिर उस के पापा मुकेश खन्ना जी अपनी बेटी को अपने प्यार के लिए तड़पता हुआ देखते हैं वो अपने पति के प्यार के बिना नहीं रह सकती, वो उसे माफ़ करते है और अपने दामाद को एक्सेप कर लेते हैं। )
और मुझे पता चला की उस फ़िल्म मैं मेरे co actor दिल्का रिश्ता मैं ऐश्वर्या राइ और चेहरा फ़िल्म मैं बिपाशावासु के साथ काम कर चुके Priyanshu Chatterjee सर थे, यह वो हीरो थे जिनका मैं ने पहली बार ऑटोग्राफ लिया था। मेरी ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं था। मैं ने वो फ़िल्म साइन कर ली, फिर दोनों मूवीज़ एक साथ शूट हो रही थी और दोनों एक साथ रिलीज़ होने वाली थी मगर ओ पुष्पा आई हेट टियर्स 2020 मैं रिलीज़ हो गई उसके बाद लॉक डाउन हो गया फिर 2022 main 3shyaane release हुई. अभी मैं नई स्क्रिप्ट की तलाश मैं हूँ।

3. अबतक आप कौन सी फ़िल्मों में अभिनय कर चुकी है इसमें वो कौन सी फिल्म रही जिसमे आप को अभिनय कर बहुत सुकून मिला ?

यूँ तो मैं ने काफ़ी सारीफ़िल्में की हैं मगर जो रिलीज़ हो सकी वो थीं। पालीनिअप्पा कल्लूरी 2009 । या रब 2014 । ओ पुष्पा आई हेट टियर्स 2020 । 3 शयाने 2022 ।
मुझे अपनी सभी मूवीज़ से तह दिल से बेहद मोहब्बत हैं । मगर अब तक मुझे सुकून कहीं नहीं मिला मेरे अंदर का कलाकार तड़प रहा है , मैं किसी भी तरह का रोल कर सकती हूँ चाहे वो नेगेटिव हो या पॉजिटिव मेरे अंदर के कलाकार को सैटिस्फाइ करने के लिए अब मुझे धमदार किरदार के साथ साथ दमदार मेकर्स भी चाहिए।

4. आप का जुड़ाव प्रिंट और वीडियो विज्ञापन में रहा इसमें चुनौतीपूर्ण क्या रहा दर्शको से साझा करें ?

यूं तो हर काम एक नई चुनौती होता है। मेरे लिये काम पाना बहुत मुश्किल होता है करना उतना मुश्किल नहीं , मैं जब अपने किरदार को समझ सकती हूँ तो उसे निभा भी सकती हूँ, एक अभिनेत्रि के रूप मैं, में हर वो रोल करना चाहती हूँ जिसे लोग सदियों सदियों तक याद रखें। मेरा सही वक़्त अभी तक आया नहीं। आने वाला है। सही लोगों का मिलना तक़दीर की बात है

जब आप का कोई एजेंट ना हो कोई हेल्प कोई सपोर्ट ना हो कोई guide करने वाला ना हो तो सब कुछ ख़ुद करना पढ़ता है तो हर काम ही चुनौतीपूर्ण होता है, मगर फिर भी मेरी क़िस्मत अच्छी थी मुझे कुछ लोग बहुत अच्छे इंसान मिले। जिन्होंने मुझे हमेशा अपनों की तरह ट्रीट किया। काम मैं ना सही पर ज़िंदगी में हमेशा सही रास्ते पर चलने की सलाह दी । हमेशा सही लोगों का चुनाव करना आपकी नियत पे निरभर करता है. जब आपकी नियत अच्छी होती है तो सब सही होता है।

5 . फिल्मी करियर में आप सफल रही इसका श्रेय किसे देगी ?

सबसे पहले उस मालिक को जिसने मुझे बनाया उसके बाद अपने माँ बाप का जिन्हो ने मुझे जन्म दिया। उसके बाद मेरी छोटी बहन ज़ोहरा मुग़ल का जिसने हमेशा दुख सुख में मेरा साथ दिया, उसके बाद सभी बॉलीवुड कॉर्डिनेटर्स मैनेजर्स सेक्रेटेरीज डायरेक्टर्स प्रोड्यूसर्स राइटर्स ऐक्टर्स मेक अप हेयर कॉस्ट्यूम मेरी सारी फ़िल्मों और विज्ञापन से जुड़े हुए सभी लोगों का जिन्हों ने मुझे काम दिया या दिलाया, जिन्हों ने मुझे प्रमोट किया जिन्हों ने मुझे अवॉर्ड्स दिए । और आख़िर मैं उनका जिन्होंने मेरे बिल्स तब भरे जब मेरे पास ना काम था ना पैसे थे। मैं सबका उन सबका बहुत बहुत शुक्रिया अदा करती हूँ। मैं अपने दोस्तों को भी धन्यवाद बोलना चाहती हूँ। मैं अपने सारे दोस्तों से बहुत प्यार करती हूँ। और यह प्यार मेरे दिल में हमेशा के लिए महफ़ूज़ रहेगा। मेरे कुछ फ़्रेंड्स ऐसे हैं जिनके लिए मैं जान भी दे दूँ तो कम है। मैं दोस्ती करती हूँ तो सिर्फ़ एक तरफ़ा। कुछ मेरे दुश्मन हैं जो मुझे बहुत पसंद हैं। वो दुश्मनी निभाते हैं मैं अपने आपको उनके वार से बचाते हुए उनसे भी दोस्ती निभाती हूँ। आख़िरकार सभी इंसान हैं। जब प्यार की कमी महसूस होती है तो लोग दुश्मन बन जाते हैं और दुश्मनी को प्यार से ही ख़त्म किया जाता है।

6. हाल ही में फिल्म एनिमल के बारे में क्या ख्यालात है और फिल्मे बॉक्स ऑफिस पर सफल रही इसके बारे में क्या कहना चाहती है ?

रनबीर कपूर जी स्टारर फ़िल्म एनिमल, मुझे अच्छी लगी। रनबीर मुझे बहुत अच्छे लगते हैं ऐज़ ऐन एक्टर, असल में उन्हें ही देखने गई थी। हमारी फ़िल्म इंडस्ट्री की जो फ़िल्मी फ़ैमिलीज़ हैं उनकी अपनी लॉगसी है उनकी क़दर करनी चाहिए। कहाँ पृथ्वी राजकपुर से राज कपूर उनसे ऋषि कपूर फिर रनबीर कपूर। अपने परदादा को कभी नहीं देखा मगर उनके दादा pardada को भी देखा है यह कोई मामूलीबात नहीं। भगवान रनबीर को और उनके परिवारको सलामत रखे। फिर कहना चाहूँगी मैं उस टाइप कि ऑडियंस हूँ जो अभी भी हीरो हेरोइन को देखने जाते हैं।
बॉबी देओल जो की मेरे बचपन से पसंदीदा हीरो है मैं ने उनकी सभी मूवीज़ देखी हैं स्पेशली रानी मुखर्जी के साथ बिछु। मुझे वो बहुत अलग लगते हैं , सिर्फ़ Bobbyजी ही नहीं बल्कि उनका पूरा परिवार मुझे बहुत अच्छा लगता है। इंफ़ैक्ट मैं sir धरम जी से भी मिली थी। बड़ा दिलचस्प क़िस्सा हो गया था मेरे साथ । मुझे किसी ने mumbai mirror न्यूज़ पेपर की पार्टी में बुलाया मैं यूँही वहाँ पूछती तो सब मीडिया चिल्लाने लगे मैं बड़ी खुश हो गई सब मुझे देख के खुश हैं। मैं ने सोचा आख़िर हुआ क्या? कहीं ऐसा तो नहीं जो कहते हैं रातो रात स्टार बन जाना। कहीं वहीं तो नहीं हो गया मेरे साथ। हाहाहा…. मैंने बड़े जोश जोश में पोज़ मारना शुरू किया जब थोड़े फ़ोटोज़ हो गये तो मेरे पीछे से आवाज़ आयी उहूँ … मैं ने पीछे मुड़के देखा तो sir धरम जी। बहुत लोगों के साथ खड़े प्रेस उनके लिए हल्ला मचा रही थी। और मैं बेवक़ूफ़ों की तरह उनके आगे जाके खड़ी हो गई। बाद मैं बहुत शर्मिंदा हुई और मैं ने पीछे जाके उनके साथ फोटो खिंचवाया और वहाँ से भाग गई।
ख़ैर हम एनिमल पे आते हैं। फ़िल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक अच्छा था और सबकी परफ़ॉर्मेंस अच्छी थी इंफ़ैक्ट रश्मिका ने भी बहुत अच्छा काम किया। अनिल कपूर जी ने बहुत अच्छा काम किए सुरेश ओबरॉय साहब को देख के बहुत अच्छा लगा। कहानी जो कहती है की एक बाप के लिए बेटे की इस क़दर मोहब्बत चाहे वो पलट के प्यार करे या ना करे,अलग बात थी। सब कुछ अच्छा था और जिस तरह से औरतों को ट्रीट किया जाता है चाहे वो रणबीरजी के करैक्टर की वाइफ हो या बॉबीजी की , जो फ़िल्म ने दिखाया। वाक़ई लोगों को सीखने की ज़रूरत है औरत को इतना बेइज्जत और ज़लील नहीं करना चाहिये यह फ़िल्म समाज की ग़लत सोच को दिखाती है। सीखने वाली बात यह है कि लड़ाई पैसे की नहीं ना मज़हबोंकी है। लड़ाई असल मैं प्यार की है प्यार और इज़्ज़त की है यह दोनों ना मिलने के बाद ही इंसान दौलत की लालच के बारे मैं सोचता है और दौलत के बारे मैं सोचते ही मज़हबी लड़ाइयों पे उतर जाता है। मज़हब जीने के तरीक़े बताता है मगर जब भी आप मज़हब को बिज़नेस बनायेंगे यह सिर्फ़ नुक़सान देगा। और यह फ़साद सिर्फ़ सामने वाले को नुक़सान नहीं करेगा यह फ़साद करने वाले का घर भी ले डूबेगा। इसलिए मोहब्बत करो। कम पैसे मैं भी खुश रहते हैं लोग अगर प्यार और इज़्ज़त हो तो। जहां औरत की वैल्यू नहीं होगी वहाँ इंसानियत आगे नहीं बढ़ पाएगी। बहुत जल्द आप बेबस लचर और मजबूर पाए जाएँगे।

7. किस तरह की फिल्में बनाने में आप तत्पर रहती है सामाजिक सरोकार के बारे में क्या कहना चाहती है ?

ऐसी फ़िल्में जो हर इंसान के दिल को छू जाए। जिनमें सीख हो प्यार मोहब्बत हो ज़िंदगी की ख़ूबसूरतियाँ दिखाई जाए और जीने का हुनर सिखाती हों जो फ़िल्में जीने के लिए मोटीवेट करती हूँ प्रॉब्लम्स के हाल बताती हों ऐसी फ़िल्में जिन्हें देख कर जीने का मन करे ख़ुशी महसूस हो जिन फ़िल्मों मैं कॉमेडी हो लव स्टोरीज़ हों मेक अप कॉस्ट्यूम्स हों ख़राब से ख़राब दिखने वाले को भी मेक अप करके अच्छा दिखाया जाये यार।ज़िंदगी को खूबसूरत दिखाया जाए। जैसे 90s से पहले कुछ बड़ी अच्छी फ़िल्में बनती थी फ़िल्म कम से कम 3 घंटे की होनी चाहिए तब तो थियेटर में बैठने का मज़ा है।एक डेढ़ घंटे की फ़िल्म कोई फ़िल्म है आपके पास इतना भी टाइम नहीं है तो थियेटर जाने का मतलब नहीं। इंसानों को खूबसूरत दिखाया जाए। सभी खूबसूरत ही होते हैं। सिर्फ़ बुरे एहसास और महसूस ही इंसान को बदसूरत दिखाते हैं। अगर मैं किसी की मदद करने के काबिल हूँ तो मैं ज़रूर करूँगी अगर नहीं कर सकी तो भगवान/ख़ुदा जिसने भी मुझे बनाया उस से माफ़ी माँग लुंगी।

8. किस तरह की stroy आप पसंद करती है

ऐसी फ़िल्में जो एंटरटेनमेंट के लिए बनती हैं। मैं सबको खुश देखना चाहती हूँ। मैं काफ़ी एक्स्प्लोर कर चुकी हूँ अपने आपको अब तक। और एक्स्प्लोर नहीं करना चाहती। मैं कॉमेडी लव स्टोरीज़ करना चाहती हूँ । प्रॉपर कहानी जो फ़िल्म की तरह हो ना की किसी डाक्यूमेंट्री या न्यूज़ की तरह। या सिर्फ़ औरत का बदन दिखाने का काम करने वाली फ़िल्में। जो कहती हैं नंगपाना ही सिर्फ एक्टिंग है।

9. रील और रियल लाइफ में क्या आकलन करती है ?

रियल लाइफ मुख्य सब्जेक्ट हैं। और रील लाइफ ऑब्जेक्ट
मुझे दोनों पे गौर करना चाहिए रील लाइफ मुझे बहुत कुछ सिखाती है जो रियल लाइफ में काम आता है। रियल लाइफ जड़ है रील लाइफ पेड़। मगर मेरी रियल लाइफ जीरो है मैं सिर्फ़ रील लाइफ को ही अपनी ज़िंदगी समझती रही हूँ। जब भी मेरा काम ना दिखे तो समझ जाना मैं बहुत उदास हूँ। । मैं नहीं जानती कब मुझे एक्टिंग से या कला से इतना प्यार हो गया की सब इंसान भी इस के सामने बेजान लगते हैं। जब भी मैं अपने आपको स्क्रीन पे देखती हूँ तो मुझे लगता है मैं वहाँ ज़िंदा हूँ मगर असल ज़िंदगी मैं मुझे किसी भी चीज़ मैं कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं। मैं शायद रूहानी ज़िंदगी ज़्यादा जीती हूँ।

10. हाल में बनने वाली फिल्मों के बारे में आप क्या कहेगी

फ़िल्में कई तरह की होती हैं। फ़िल्में समाज का नंगा सच दिखाती है ताकि हो रहे ग़लत कामों को ठीक किया जाये। हमारी फ़िल्म इंडस्ट्री आगे बढ़ रही है मगर अब कुछ फ़िल्मों में सची कहानियों मैं मिलावट हो रही है।और वो मिलावटसाफ़ दिखाई देती है। किसी ने बहुत खूब कहा है
“सच घाटे या भाड़े तो सच ना रहे
और झूठ की कोई इन्तहा ही नहीं”
डिफरेंट डिफरेंट तरह के आइडियाज़ को एक्स्प्लोर करना चाहिये एक जैसी फ़िल्में नहीं बननी चाहिए नए ज़माने कि नई कहानियां होनी चाहिए और हर gener की फ़िल्में बननी चाहिए । कलाकारों को उनके कामों से तोलना चाहिए उनकी हैसियत से नहीं। फ़िल्में बदल रही हैं और बदलाव सृष्टि का नियम है। लोगों को भी बेहतरी के लिए बदलना चाहिए । आगे बढ़ते रहो और अच्छी अच्छी फ़िल्में बनाते रहो। मैं उन सभी लोगों से बहुत मोहब्बत करती हूँ जो फ़िल्में बनाते हैं और फ़िल्मों से प्यार करते हैं।

11. मुंबई जैसे शहर में एक्टर बनने वाले लोगो की जीवन में कैसा स्ट्रगल रहता है अपने आप को स्थापित करना कितना चुनौती पूर्ण?

आपको बहुत सीखना पड़ता है अभिनय बहुत आज़ाद ख़याल से होता है एक अभिनेता या अभिनेत्री को अपनी सोच को आज़ादी से समेत कर किरदारों में बढ़ाना पड़ता है। और बहुत इंतज़ार करना पड़ता है नींदों का त्याग करना पड़ता है सबकी इज़्ज़त करनी पड़ती है। हमेशा हेल्थी ख़ाना पड़ता है एक्सरसाइज़ पूरी उम्र करनी पड़ती है। दिल से बहुत मज़बूत रहना पड़ता है। यह ऐसी जंग है जिसे हर वक़्त लड़ते रहना पड़ता है उसे कोई फ़ॉजी नहीं लैड सकता उसे सिर्फ़ एक एक्टर लैड सकता है। यह सच मैं इंसान की तक़दीर की आज़माइश है। इंसान की ऑलमोस्ट जान निकल जाती है पर उसे ज़िंदा दिखना पड़ता है। खुश और खूबसूरत ही दिखना पड़ता है। यह बिलकुल आसान नहीं है। यह तक़दीर का खेल है। मगर जुनून ही एक एक्टर की रूह है।वहीं उस से काम करवाता है। आपको खूबसूरत बनना पड़ता है अट्रैक्टिव दिखना पड़ता है फिर जब लोग आपसे attract हो तो फिर उनसे बचना भी पड़ता है। स्पेशली ऐक्टर्स से हर शख़्स को कम्पीट करना होता है चाहे वो कुछ भी करते हों। और उनका इस कम्पटीशन से कोई फ़ायदा ना हो रहा हो वो कितने भी बड़े इंसान हो एक फेमस और बड़े एक्टर के सामने काफ़ी लोग अपने आपको छोटा और कम महसूस करते हैं। यह ठीक नहीं ऐक्टर्स सबकुछ जज़्बातों में दे देने वाले फ़क़ीर होते हैं। उनकी इज़्ज़त किया करो। पूरे फ़िल्म की टीम में कुछ लोगों को ऐक्टर्स से बेहद ख़ून्नास रहती है जिसके पीछे वजह यह होती है की मैक्सिमम लोग एक्टर बनने आते हैं मगर वो किसी दूसरे काम मैं एक्टिंग से ज़्यादा बेहतर होते हैं इसलिए उन्हें अपर वाला दूसरे काम में लगा देता है तो अपने अंदर भगवान के बजाए एक्टर पे ग़ुस्सा निकलते हैं। और ऐक्टर्स को सहन करना पड़ता है हर जगह क्यों जहां वो बोला वहाँ वो गया आख़िरकार एक एक्टर को ही ग़लत साबित कर दिया जायेगा इसलिए एक एक्टर को बहुत बर्दाश्त करना पड़ता है। यह ऐसा है जैसे रोटी को चौड़ा करने के लिए उसे हथेलियों से थप्पड़ पे थप्पड़ पढ़ते है आख़िर मैं खूबसूरत रोटी तैयार होती है।

12. आप शैक्षणिक संस्थानों से जुड़ी रही इसके बारे में बताए?

सीख ज़िंदगी की सबसे महत्व्पूर्ण चीज़ है मैंने जो कुछ भी किया वो अपनी एजुकेशन knowledge और इंटेलिजेंस के बल पे कर पाई। इसलिए मैं उन सब लोगों के साथ खड़ी हूँ जो पढ़ना चाहते हैं। बिना पढ़े आप कुछ नहीं बनेंगे।हर बात भगवान पे छोड़ देंगे। मैं ने अपनी ज़िंदगी मैं इंसान के रूप मैं बहुत जाहिल हैंडल किए हैं। जो जाहिल सिर्फ़ इसलिए थे क्योंकि वो पढ़े लिखे नहीं थे । अगर आप शिक्षा हासिल करते हैं तो आप ज़िंदगी के किसी भी पढ़ाव को पार कर सकते हैं मैं कहूँगी बूढ़े जवान या बच्चे औरत या मर्द सभी शिक्षा हासिल करो । पढ़े लिखे लोग प्रैक्टिकल होते हैं इसलिए सही ज़िंदगी गुज़रते हैं। और अनपढ़ बहुत इमोशनल होते हैं पूरी ज़िंदगी रोते हुए गुज़रते हैं। पढ़ा लिखा इंसान इतना नहीं रोता ज़िंदगी में जितना एक अनपढ़। सभी पढ़ा करो।

13. आप अपने बारे में बताए कितना सफल रही ग्लैमर की दुनिया में ?

बहुत इज़्ज़त बहुत प्यार मिला। बहुत सच्चे सीधे और भोले लोग मिले मुझे। काम भी बहुत मिला विज्ञापन में । मगर मैं ज़्यादा पैसा नहीं कमा सकी क्योंकि अगर मुझे काम पसंद आ जाए तो मैं पैसा नहीं देखती।
मैं ने जबसे होश सम्भाला बचपन से बहुत अकेलापन महसूस की । जब भी मुझे बेहद अकेलापन महसूस होता तो मैं रोने लगती। मगर जो चीज़ मेरे अकेलापन को दूर करती है वो है एक्टिंग मेरा काम मुझे इतनी ख़ुशी देता है की मैं सब भूल जाती हूँ। मैं बोलना कुछ चाहती हूँ बोल कुछ देती हूँ और फिर मैं हमेशा हाल्ट समझी जाती हूँ।
आजतक मुझे कभी नहीं लगा की कोई एक भी इंसान मुझे समझ सके या मुझसे कनेक्ट हो सके । मैं बहुत कम उम्र में ही समझ गई थी मुझे कोई नहीं समझता और ना कोई समझ पाएगा।
जब लोग मुझसे मेरे बारे मैं बताते हैं तो मुझे समझ आता है की कितना अलग है मेरा सच लोगों की नज़रों में ।
अब किसी से कोई उम्मीद नहीं। अब समझ गई हूँ की
“आई एम द ओनली लेजेंड” हाहाहा…….…….

14 . चलते चलते दर्शकों से क्या कहना चाहती है?

– कहना चाहूँगी लोग इस दुनियाँ मैं आते हैं चले जाने के लिए। और इस दुनियाँ मैं वहीं आते हैं जिन्हें सज़ा दी जाती है जीने की । बचपन से लेके जवानी तक चमत्कार ही चमत्कार होते हैं।जोश जुनूनऔर जवानी। ताकि आपको जीने की इच्छाएँ पैदा हों जब आप जीने की कौशिश करने लगते हैं तो ज़िंदगी एक सज़ा बन जाती है इस से फ़र्क़ नहीं पड़ता आप अमीर हैं या गरीब। आपके शरीर मैं आपकी रूह बेबस तड़पती रहती है। जहां आपको ना चाहते हुए भी जीना पड़ता है। हम सबको धोखे से फँसाया गया है इस दुनियाँ में । वक़्त की दौड़ मैं। भगवान खेल रहा है। इस दुनियाँ मैं जब सज़ा पूरी हो जाती है तो इंसान को इस दुनियाँ से उठा लिया जाता है। जो है उसी में खुश रहो और हमेशा विनम्र् रहो। ज़िंदगी पूरी करो और जाओ इस दुनियाँ से । यहाँ किसी चीज़ की कोई वैल्यू नहीं हम जो भी करते हैं इस दुनियाँ में यह सब नक़ली है इसका कोई वजूद नहीं। सब टेम्पोररी है। असली सिर्फ़ हमारी रूह है बाक़ी सबकुछ नक़ली। जब आप कुछ हासिल करना चाहते हैं तो आपने महसूस किया होगा हासिल करने के बाद। क्या जो आपने हासिल किया वो इतना ज़रूरी था की आपकी ज़िंदगी उसके बिना नहीं चल सकती थी। हासिल करने के बाद क्या हो गया? यह ज़िंदगी ख़ाब है यहाँ किसी का बुरा मत सोचो किसी का बुरा मत करो वरना सज़ा लंबी हो सकती है अपने अपने मज़हबों की बतायी हुई सीख पे चलो और सबसे प्यार करो । आप एग्जाम में हो ऑब्जरवेशन में हो। इसलिए जितनी ग़लतियाँ करोगे उतनी सजाएं पाओगे। आपकी आज़माइश यह है की आप कितने सही इंसान साबित होते हैं। हम सभी मिलेंगे उस दुनिया मैं, कभी ना बिछड़ने के लिए। जहां ना कोई मरता ना जीता ना कोई छोटा ना बड़ा ना कोई आगे ना पीछे वहाँ सिर्फ़ तुम ही तुम हो।और जो कुछ है उस दुनियाँ में वो सब सच है मगर यहाँ आप जो कुछ देख रहे हैं सबकुछ झूठ। यहाँ तक कि तुम भी और मैं भी। ना दुनियाँ मैं कोई कहानी रहेगी, यह दुनियाँ फ़ानी है फ़ानी रहेगी
सुकिया आप का