कौशाम्बी।पुरातन काल में वत्स देश की राजधानी और बौद्ध नगरी के रूप में विश्व विख्यात कौशांबी में शुक्रवार को वैशाख बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर आस्था, श्रद्धा और उत्साह का अभूतपूर्व संगम देखने को मिला। भगवान महात्मा बुद्ध की जयंती पर देश-विदेश से बड़ी संख्या में उनके अनुयायी यहां पहुंचे और प्राचीन बौद्ध स्थलों पर पूजा-अर्चना कर माथा टेकते हुए उनकी चिर स्मृतियों को नमन किया।यमुना तट पर बसे ऐतिहासिक नगर कौशांबी का महात्मा बुद्ध से गहरा संबंध रहा है। प्राकृतिक सौंदर्य और समृद्धि से परिपूर्ण इस नगरी से प्रभावित होकर भगवान बुद्ध कई बार यहां पधारे थे। उस समय वत्स देश के राजा महाराज उदयन कला और संगीत के प्रेमी थे, जिनसे बुद्ध भी प्रभावित हुए। अपने ज्ञान प्राप्ति के छठे और नवें वर्ष में बुद्ध कौशांबी आए और यहां वर्षावास के दौरान चार माह तक निवास कर सत्य, अहिंसा और करुणा का संदेश जन-जन तक पहुंचाया।इसी कालखंड में बुद्ध के अनुयायियों द्वारा प्रसिद्ध घोषीताराम बौद्ध विहार का निर्माण कराया गया, जहां एक साथ लगभग 16 हजार बौद्ध भिक्षुओं को उन्होंने उपदेश दिया। आज भी यमुना किनारे स्थित इस विहार के खंडहर उस गौरवशाली इतिहास के मौन साक्षी बने हुए हैं।बुद्धकाल में कौशांबी बौद्ध धर्म का प्रमुख केंद्र बन गया था। यही कारण है कि आज भी विश्वभर के बौद्ध अनुयायी यहां आने को आतुर रहते हैं। चीन के प्रसिद्ध यात्री ह्वेनसांग ने भी अपने यात्रा वृत्तांत में कौशांबी के बौद्ध स्थलों का उल्लेख करते हुए यहां स्थित विशाल विहार, चंदन की बुद्ध प्रतिमा, कूप और स्नानागार का वर्णन किया है।वर्तमान में यमुना तट के समीप कोसम इनाम और कोसम खिराज सहित विस्तृत क्षेत्र को संरक्षित किया जा रहा है, जहां बुद्धकालीन स्मृतियां आज भी बिखरी पड़ी हैं। श्रीलंका और कंबोडिया सरकारों द्वारा यहां बौद्ध मंदिरों का निर्माण कराया गया है, जो अंतरराष्ट्रीय श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं।जापान, कोरिया, श्रीलंका, कंबोडिया, मलेशिया, थाईलैंड, नेपाल, सिंगापुर, चीन और इंडोनेशिया सहित कई देशों से बौद्ध अनुयायी वर्ष भर यहां आते रहते हैं। प्रदेश सरकार भी यहां आने वाले पर्यटकों के ठहरने और सुविधाओं के विस्तार के लिए निरंतर प्रयासरत है।बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर शुक्रवार को बौद्ध भिक्षुओं द्वारा विधि-विधान से पूजा-अर्चना की गई। पूरा क्षेत्र “बुद्धं शरणं गच्छामि” के मंत्रों से गूंज उठा, जिससे वातावरण पूर्णतः आध्यात्मिक हो गया।बुद्ध पूर्णिमा पर बौद्ध नगरी कौशांबी में उमड़ा आस्था का सैलाब, देश-विदेश से पहुंचे हजारों श्रद्धालु
कौशाम्बी।पुरातन काल में वत्स देश की राजधानी और बौद्ध नगरी के रूप में विश्व विख्यात कौशांबी में शुक्रवार को वैशाख बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर आस्था, श्रद्धा और उत्साह का अभूतपूर्व संगम देखने को मिला। भगवान महात्मा बुद्ध की जयंती पर देश-विदेश से बड़ी संख्या में उनके अनुयायी यहां पहुंचे और प्राचीन बौद्ध स्थलों पर पूजा-अर्चना कर माथा टेकते हुए उनकी चिर स्मृतियों को नमन किया।यमुना तट पर बसे ऐतिहासिक नगर कौशांबी का महात्मा बुद्ध से गहरा संबंध रहा है। प्राकृतिक सौंदर्य और समृद्धि से परिपूर्ण इस नगरी से प्रभावित होकर भगवान बुद्ध कई बार यहां पधारे थे। उस समय वत्स देश के राजा महाराज उदयन कला और संगीत के प्रेमी थे, जिनसे बुद्ध भी प्रभावित हुए। अपने ज्ञान प्राप्ति के छठे और नवें वर्ष में बुद्ध कौशांबी आए और यहां वर्षावास के दौरान चार माह तक निवास कर सत्य, अहिंसा और करुणा का संदेश जन-जन तक पहुंचाया।इसी कालखंड में बुद्ध के अनुयायियों द्वारा प्रसिद्ध घोषीताराम बौद्ध विहार का निर्माण कराया गया, जहां एक साथ लगभग 16 हजार बौद्ध भिक्षुओं को उन्होंने उपदेश दिया। आज भी यमुना किनारे स्थित इस विहार के खंडहर उस गौरवशाली इतिहास के मौन साक्षी बने हुए हैं।बुद्धकाल में कौशांबी बौद्ध धर्म का प्रमुख केंद्र बन गया था। यही कारण है कि आज भी विश्वभर के बौद्ध अनुयायी यहां आने को आतुर रहते हैं। चीन के प्रसिद्ध यात्री ह्वेनसांग ने भी अपने यात्रा वृत्तांत में कौशांबी के बौद्ध स्थलों का उल्लेख करते हुए यहां स्थित विशाल विहार, चंदन की बुद्ध प्रतिमा, कूप और स्नानागार का वर्णन किया है।वर्तमान में यमुना तट के समीप कोसम इनाम और कोसम खिराज सहित विस्तृत क्षेत्र को संरक्षित किया जा रहा है, जहां बुद्धकालीन स्मृतियां आज भी बिखरी पड़ी हैं। श्रीलंका और कंबोडिया सरकारों द्वारा यहां बौद्ध मंदिरों का निर्माण कराया गया है, जो अंतरराष्ट्रीय श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं।जापान, कोरिया, श्रीलंका, कंबोडिया, मलेशिया, थाईलैंड, नेपाल, सिंगापुर, चीन और इंडोनेशिया सहित कई देशों से बौद्ध अनुयायी वर्ष भर यहां आते रहते हैं। प्रदेश सरकार भी यहां आने वाले पर्यटकों के ठहरने और सुविधाओं के विस्तार के लिए निरंतर प्रयासरत है।बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर शुक्रवार को बौद्ध भिक्षुओं द्वारा विधि-विधान से पूजा-अर्चना की गई। पूरा क्षेत्र “बुद्धं शरणं गच्छामि” के मंत्रों से गूंज उठा, जिससे वातावरण पूर्णतः आध्यात्मिक हो गया।RELATED ARTICLES
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