नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने सबरीमाला मंदिर मामले की सुनवाई के दौरान गुरुवार को कहा कि यदि धार्मिक प्रथाओं और रीति-रिवाजों को लगातार अदालत में चुनौती दी जाने लगी, तो इसका धर्म और समाज दोनों पर व्यापक असर पड़ सकता है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ सदस्यीय संविधान पीठ ने कहा कि ऐसा होने पर हर धार्मिक परंपरा को अदालत में चुनौती मिलने लगेगी और इससे सैकड़ों याचिकाएं सामने आ सकती हैं।
सुनवाई के दौरान जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि भारतीय समाज धर्म से गहराई से जुड़ा हुआ है। ऐसे में यदि हर व्यक्ति धार्मिक प्रथाओं पर सवाल उठाने लगे, तो इसका सामाजिक ढांचे पर असर पड़ सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि अदालत के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि धार्मिक सुधार समाज और पंथों के भीतर से आने चाहिए या सरकार और अदालत के हस्तक्षेप से।
सुधारवादियों की ओर से वरिष्ठ वकील राजू रामचंद्रन ने दलील दी कि किसी धर्म के सामाजिक और धर्मनिरपेक्ष कार्य संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत पूर्ण संरक्षण के दायरे में नहीं आते। इस पर पीठ ने धार्मिक परंपराओं को चुनौती देने की सीमा और प्रक्रिया पर गंभीर चिंता जताई।
इससे पहले अदालत ने दाऊदी बोहरा समुदाय में बहिष्कार की परंपरा से जुड़े 1962 के फैसले को चुनौती देने के तरीके पर भी सवाल उठाए थे। वहीं 5 मई को कोर्ट ने इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन की 2006 की याचिका को कानून के दुरुपयोग जैसा बताते हुए फटकार लगाई थी।
गौरतलब है कि 28 सितंबर 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने 4-1 के बहुमत से सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के पक्ष में फैसला दिया था। अदालत ने कहा था कि महिलाओं के साथ धार्मिक आधार पर भेदभाव संविधान के मूल अधिकारों के खिलाफ है।
सबरीमाला मंदिर मामले की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने उठाए धार्मिक दखल पर सवाल
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