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तहसील में पढ़े-लिखे कर्मचारियों की मारपीट से उठे सवाल, क्या यही है प्रशासन का अनुशासन? 

  • पेशकार ने बाहरी लोगों को बुलाकर नाजिर की मारपीट 

बाराबंकी। तहसील रामनगर में गुरुवार को नाजिर और तहसीलदार के पेशकार के बीच हुआ विवाद मारपीट तक पहुंचने से सरकारी व्यवस्था और अधिकारियों की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। बताया जा रहा है कि बिजली की बचत को लेकर शुरू हुआ विवाद गुरुवार शाम हिंसक रूप ले बैठा। आरोप है कि पेशकार ने बाहरी लोगों को बुलाकर नाजिर के साथ मारपीट की। घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने का दावा किया जा रहा है, हालांकि इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।

सबसे गंभीर बात यह मानी जा रही है कि यह पूरी घटना तहसीलदार की मौजूदगी में हुई, लेकिन समय रहते स्थिति को नियंत्रित नहीं किया जा सका। कर्मचारियों के बीच यह चर्चा भी रही कि बाद में पीड़ित पक्ष को ही विवाद बढ़ाने से रोकने और समझौता करने का दबाव बनाया गया। यदि यह सही है तो यह संदेश बेहद चिंताजनक है कि नियमों का पालन करने वाले कर्मचारी की बजाय दबंगई करने वालों को संरक्षण मिल रहा है।

तहसील जैसे संवेदनशील सरकारी कार्यालय में शिक्षित अधिकारियों और कर्मचारियों से कानूनसम्मत व्यवहार की अपेक्षा की जाती है। यदि वहीं मारपीट, बाहरी लोगों के द्वारा दखल मारपीट और पक्षपात की चर्चाएं हों,तो जनता के बीच प्रशासन की साख कमजोर होना स्वाभाविक है। लोग सवाल उठा रहे हैं कि जब सरकारी दफ्तरों में ही अनुशासन नहीं रहेगा तो आम नागरिक कानून पर कैसे भरोसा करेगा।

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दो साल पहले हुआ था पेशकार का हैदरगढ़ ट्रांसफर पहुंच के आगे रामनगर में जमाए साख
पेशकर आशुतोष के पिता स्व अनिल सिंह जो संग्रह अमीन के पद पर तैनात थे उनकी मृत्यु के उपरान्त अनुकम्पा के आधार पर इन्हें नौकरी मिली और बतौर पेशकार न्यायालय तहसीलदार तैनात कर दिए गए जबकि अन्य विभागीय लोगों का मानना है कि इनको नियमानुसार कलेक्शन पटल पर ही तैनाती मिलनी चाहिए! वर्षों से जमे पेशकार की कार्यशैली भी जनमानस में निराशाजनक है!

मुख्य विकास अधिकारी अन्ना सुदन ने मामले की जांच कराने की बात कही है। अब सभी की निगाहें इस बात पर हैं कि जांच निष्पक्ष होगी या मामला केवल समझौते तक सीमित रह जाएगा। जनता का मानना है कि दोषी चाहे कोई भी हो, उसके खिलाफ निष्पक्ष कार्रवाई ही प्रशासन की विश्वसनीयता बनाए रख सकती है।

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