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SC-ST ऐक्ट में केस आसान, अंजाम मुश्किल, एक तिहाई मामलों में ही हो पाती है सजा

भारत में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लोगों से होने वाले भेदभाव को रोकने के लिए एक अलग कानून है। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति कानून (अत्याचार निवारण) 1989, नाम का यह यह कानून गैर-जमानती प्रावधानों की वजह से चर्चा में रहता है। समाज में दलित मानी जाने वाली जातियों के खिलाफ भेदभाव और हिंसा को रोकने के लिए बने इस कानून के तहत बिना शुरुआती जांच के गिरफ्तारी हो सकती है। इस सब के बावजूद आंकड़े बताते हैं कि एक तिहाई केस ही ऐसे होते हैं जिनमें सजा हो पाती है। बाकी के मामलों में आरोपी अलग-अलग कारणों से छूट जाते हैं।

कड़े कानून और सख्त सजा के बावजूद दोष सिद्धि कम होना यह दिखाता है कि कई बार इन कानूनों का या तो दुरुपयोग किया जाता है या फिर दोष साबित कर पाना आसान नहीं होता है। बता दें कि यह कानून तब लागू होता है जब किसी भी SC या ST शख्स को जातिसूचक शब्दों से अपमानित किया जाए, जाति आधारित भेदभाव किया जाए, कोई अमानवीय कृत्य हो या फिर किसी शख्स को जबरन जमीन से बेदखल कर दिया जाए।

क्या कहते हैं आंकड़े?

SC-ST ऐक्ट 1989 के तहत दर्ज होने वाले मुकदमों को लेकर राज्यसभा सांसद चंद्रकांत हंडोरे ने सवाल पूछे थे। उन्होंने SC-ST ऐक्ट के तहत पिछले 3 साल में दर्ज हुए मुकदमों की संख्या पूछी थी। साथ ही, पेंडिंग केस, देरी का कारण और दोषसिद्धि की दर के बारे में भी सवाल पूछे थे। चंद्रकांत हंडोरे ने यह भी पूछा था कि सभी राज्यों में इस कानून के तहत कितने पीड़ितों को मुआवजा दिया गया।

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इसका जवाब सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के राज्यमंत्री रामदास आठवले ने दिया है। उन्होंने अपने जवाब में हर साल प्रकाशित होने वाली नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के डेटा का हवाला देते हुए जानकारी दी है। इस जवाब के साथ दिए गए आंकड़े बताते हैं कि हर साल लगभग 55 से 57 हजार के केस अनुसूचित जाति (SC) के लोगों के खिलाफ अपराध के तहत और लगभग 10 से 12 हजार केस अनुसूचित जनजाति के लोगों के खिलाफ अपराध के तहत दर्ज होते हैं।

साल 2022 में SC के खिलाफ अपराध के कुल 57,569, 2023 में 5776 और 2024 में 55685 केस दर्ज हुए। इसी तरह ST के खिलाफ अपराध के कुल 10064 केस 2022 में, 12959 केस 2023 में और 9961 केस 2024 में दर्ज हुए। SC के खिलाफ अपराध के सबसे ज्यादा मुकदमे उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश और बिहार में दर्ज हुए। वहीं, ST के खिलाफ अपराध के सबसे ज्यादा केस मध्य प्रदेश और राजस्थान से सामने आए। इसकी एक वजह इन राज्यों में अनुसूचित जनजातियों की ठीक-ठाक जनसंख्या भी है।

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जल्दी खत्म नहीं हो पाते केस

देश की तमाम अदालतों में पेंडिंग पड़े मुकदमों जैसा ही हाल SC-ST ऐक्ट के तहत दर्ज मुकदमों का भी है। SC के खिलाफ अपराध के 19057 मामले साल 2022 में लंबित थे, 2023 में यह संख्या 16419 हुई और 2024 में 17123 हो गई। इसी तरह ST के खिलाफ अपराध के 3350 केस 2022 में लंबित थे। 2023 में यह संख्या दोगुने से ज्यादा बढ़ गई और 6961 केस पेंडिंग हो गए और 2024 में यह संख्या 7219 तक हो गई। दर्ज किए गए मुकदमों की तुलना में देखें तो लगभग एक तिहाई केस पेंडिंग ही रह जाते हैं।

कितने लोगों को हुई सजा?

अगर दोष सिद्धि के आंकड़े देखें तो यह और भी हैरान करने वाला है। SC के खिलाफ अपराध के मामलों में दोष सिद्धि की दर साल 2022 में 34.1 प्रतिशत, 2023 में 32.4 प्रतिशत और 2024 में 33.9 प्रतिशत थी। यह दिखाता है कि जितने केस दर्ज होते हैं, उसकी तुलना में सिर्फ एक तिहाई मामलों में ही दोष साबित होता है। यहां बता दें कि दोष सिद्धि की दर निकालने के लिए अंजाम तक पहुंच चुके केस की संख्या में ट्रायल पूरा कर चुके केस की संख्या से भाग दिया जाता है और फिर 100 से गुणा कर दिया जाता है।

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ST के खिलाफ अपराध अपराध के मामलों में दोष सिद्धि की दर और कम है। साल 2022 में 28.1 प्रतिशत, साल 2023 में 24.6 प्रतिशत और साल 2024 में 33.2 प्रतिशथ मामलों में ही दोष सिद्ध हुए।

SC-ST केस के कितने पीड़ितों को मिला मुआवजा?

नियमों के मुताबिक, SC-ST ऐक्ट के तहत पीड़ितों को केंद्र सरकार की ओर से मुआवजा भी दिया जाता है। साल 2023-23 में कुल 88,172 पीड़ितों को 39.27 करोड़ रुपये का मुआवजा दिया गया। इसी तरह 2023-24 में 79667 पीड़ितों को 53.53 करोड़ और 2024-25 में 99965 पीड़ितों को कुल 49.52 करोड़ रुपये का मुआवजा दिया गया।

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