रायपुर। छत्तीसगढ़ के चर्चित सेक्स सीडी कांड में उच्च न्यायालय ने आज (गुरुवार) पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को राहत देते हुए राजेश मूणत के कथित मॉर्फ्ड सीडी मामले में सीबीआई की विशेष अदालत की आगे की कार्रवाई पर रोक लगा दी।
न्यायमूर्ति राधाकिशन अग्रवाल की एकलपीठ ने सभी पक्षों को सुनने के बाद बघेल की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह अंतरिम आदेश दिया।अब इस मामले में सितंबर माह के सप्ताह में सुनवाई होगी।
इससे पहले, मार्च 2025 में एक विशेष न्यायिक मजिस्ट्रेट कोर्ट ने पर्याप्त सबूत न होने का हवाला देते हुए भूपेश बघेल को इस मामले से आरोपमुक्त (डिस्चार्ज) कर दिया था।
हालांकि, जनवरी 2026 में सीबीआई की पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई करते हुए विशेष न्यायाधीश ने इस डिस्चार्ज आदेश को पलट दिया था। उच्च न्यायालय में सुनवाई के दौरान भूपेश बघेल के वकीलों ने तर्क दिया कि निचली अदालत आदेश के बाद आरोप तय करने की प्रक्रिया शुरू कर चुकी है।
यदि ट्रायल अदालत की कार्रवाई जारी रहती है, तो उच्च न्यायालय में दायर इस याचिका का औचित्य ही समाप्त हो जाएगा। साथ ही यह भी कहा गया कि उनके खिलाफ कोई ठोस प्रथम दृष्टया साक्ष्य मौजूद नहीं हैं।
बघेल पर आरोप था कि साल 2017 में तत्कालीन मंत्री रहे राजेश मूणत की छवि खराब करने के लिए उनका एक अश्लील मॉर्फ्ड वीडियो बनाकर फैलाया गया था। ये मामला अदालत में चल रहा था।
भूपेश बघेल ने 24 जनवरी 2026 को सीबीआई की स्पेशल कोर्ट के उस आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी, जिसमें मार्च 2025 में मिली डिस्चार्ज (आरोपमुक्त) राहत को रद्द करते हुए उनके खिलाफ आरोप तय करने का निर्देश दिया गया था।
भूपेश बघेल के वकील हर्षवर्धन परगनिहा ने बताया है कि उच्च न्यायालय में कहा कि विशेष अदालत के आदेश के बाद ट्रायल कोर्ट आरोप तय करने की प्रक्रिया आगे बढ़ा चुका है।
अगर ट्रायल जारी रहा तो उच्च न्यायालय में दायर याचिका का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। इसलिए अंतिम फैसला आने तक ट्रायल कोर्ट की कार्रवाई पर रोक लगाई जाए।
उल्लेखनीय है कि वर्ष 2017 में तत्कालीन मंत्री राजेश मूणत की छवि खराब करने के लिए उनका एक अश्लील मॉर्फ्ड वीडियो बनाकर फैलाया गया था। बाद में मामले की जांच सीबीआई को सौंपी गई।
सीबीआई ने अपने आरोप पत्र में भूपेश बघेल समेत अन्य लोगों पर आपराधिक साजिश, जालसाजी, फर्जी इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड का इस्तेमाल और अश्लील सामग्री प्रसारित करने के आरोप लगाए गए हैं ।
मार्च 2025 में विशेष न्यायिक मजिस्ट्रेट ने कहा था कि भूपेश बघेल के खिलाफ ऐसा कोई सबूत नहीं है, जिससे उन्हें इस मामले में आरोपित बनाया जा सके। इसलिए उन्हें डिस्चार्ज कर दिया गया था।
लेकिन जनवरी 2026 में सीबीआई की विशेष अदालत ने यह आदेश रद्द करते हुए उनके खिलाफ आरोप तय करने का निर्देश दिया। इसी आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई है।
भूपेश बघेल के वकील हर्षवर्धन परगनिहा ने कहा कि सीबीआई की विशेष अदालत ने अपने अधिकार से आगे बढ़कर डिस्चार्ज का आदेश पलट दिया और आरोपों की प्रकृति तक बदल दी।
जबकि ऐसा फैसला ट्रायल कोर्ट ही उचित समय पर कर सकती है।उन्होंने कहा कि किसी डिस्चार्ज आदेश में ऊपरी अदालत तभी हस्तक्षेप कर सकती है, जब वह आदेश पूरी तरह गलत हो या रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों के खिलाफ हो।
हर्षवर्धन परगनिहा ने यह भी कहा कि जांच में ऐसा कोई मजबूत सबूत नहीं है, जिससे भूपेश बघेल के खिलाफ आरोप तय किए जा सकें। केवल सह-आरोपितों के साथ होटल में ठहरना किसी साजिश में शामिल होने का सबूत नहीं माना जा सकता।
उन्होंने अदालत को बताया कि गवाहों के बयान से सिर्फ इतना पता चलता है कि भूपेश बघेल ने सह-आरोपित विनोद वर्मा की गिरफ्तारी के विरोध में प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी।
ऐसा कोई सबूत नहीं है कि उन्होंने खुद कथित आपत्तिजनक सीडी बांटी या उसका प्रसार किया। सीबीआई के वकील ने दलील दी कि सेशंस कोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद सभी सामग्रियों को देखने के बाद ही बघेल को मिली दोषमुक्ति को पलटने का सही फैसला लिया था।
इसलिए, उच्च न्यायालय को इस मामले में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए और यह याचिका खारिज होने योग्य है। इन दलीलों पर विचार करने के बाद छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने विशेष अदालत में चल रही आगे की कार्रवाई पर अंतरिम रोक लगा दी। अब अगली सुनवाई तक ट्रायल कोर्ट में भूपेश बघेल के खिलाफ आगे की कार्रवाई नहीं होगी।












