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अमोढ़ा स्थित प्राचीन चतुर्भुजी मंदिर परिसर में ज्येष्ठ माह के छठवें बड़े मंगलवार को भक्तों की भारी भीड़ उमड़ी। रामजानकी मार्ग पर स्थित इस मंदिर में हर मंगलवार को भक्त दर्शन के लिए आते हैं, लेकिन बड़े मंगलवार के अवसर पर विशेष रूप से विशाल जनसमूह देखा गया। छावनी, अमोढ़ा, विशेषरगंज, रूपगढ़, पूरेवेद धिरौली बाबू, जैतापुर, पूरे तिलक, शेखपुर, चरथी और देवखाल सहित दर्जनों गांवों से श्रद्धालु चतुर्भुज भगवान के दर्शन और पूजन के लिए पहुंचे। इस दौरान मंदिर परिसर में मेले जैसा माहौल रहा। महिलाएं लकड़ी के चूल्हे पर पूड़ी-लपसी का भोग बनाकर भगवान को अर्पित कर रही थीं। बच्चों के खिलौने, जलेबी, मिठाइयों और महिलाओं के श्रृंगार के सामान की दुकानें भी सजी थीं, जहां लोगों ने जमकर खरीदारी की। चतुर्भुजी मंदिर के महंत अनिल दास महाराज ने बताया कि क्षेत्रीय सैकड़ों गांवों के लोग मंगलवार को निरंतर मंदिर आते हैं। ज्येष्ठ माह से लेकर आषाढ़ माह के अंतिम मंगलवार, जिसे बुढ़वा मेला कहा जाता है, तक दो महीने तक भक्तों की अपार भीड़ रहती है। महंत अनिल दास महाराज के अनुसार, मंदिर से जुड़ी किंवदंती है कि कलियुग में चतुर्भुज भगवान साक्षात प्रकट हुए थे। वे अमोढ़ा के राजा ज़ालिम सिंह की गायों का दूध पी जाते थे। जब चरवाहों ने इसका पता लगाया तो राजा ज़ालिम सिंह ने भगवान का पीछा किया। भगवान पृथ्वी के अंदर समाने लगे, तब राजा ने खुदाई शुरू करवाई। तभी नीचे से आवाज आई कि “मैं तुम्हें पाषाण रूप में ही मिल सकूंगा।” इसके बाद भगवान चतुर्भुज पाषाण रूप में वहीं विराजमान हो गए, जो आज पूरे क्षेत्र में चतुर्भुजी भगवान के नाम से प्रसिद्ध हैं। क्षेत्र के श्रद्धालु अशोक सिंह, पवन मिश्र, अजीत सोनी, राहुल पाण्डेय, आशीष सिंह, अनूप मिश्र और रितेश सिंह सहित अन्य भक्तों का कहना है कि चतुर्भुज भगवान से सच्चे मन से मांगी गई सभी मुरादें पूरी होती हैं।
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ज्येष्ठ माह के 6वें मंगलवार पर मंदिरों में भीड़:अमोढ़ा के चतुर्भुजी और मांकोटही मंदिर में विधि-विधान के साथ की पूजा
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