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संपादकीय: अराजक प्रशासन! मंच टूटा, बिजली कटी, लाठियां चलीं… विरोध जारी

  • लाठीचार्ज के बाद घायल साथियों को देखकर उनका संकल्प और मजबूत

मंच टूटा, बिजली कटी, लाठीचार्ज हुआ, फिर भी जंतर-मंतर पर छात्रों का विरोध प्रदर्शन जारी है। यह दृश्य केवल एक घटना नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की उस सजीव तस्वीर को उकेरता है जिसमें युवा पीढ़ी अपनी आवाज को दबने नहीं देती। चाहे प्रशासन कितनी भी बाधाएं खड़ी करे, हौसला अगर सच्चे मुद्दों पर टिका हो तो वह टूटता नहीं। 

दिल्ली के ऐतिहासिक जंतर-मंतर पर पिछले कई दिनों से जारी छात्र आंदोलन इस सत्य को दोहरा रहा है। वहीं मेन स्ट्रीम मीडिया छात्रों को ही अराजक बताने में लगी है, विपक्ष को भी डराने की कोशिश जारी है। जब कि छात्रों की मांगें शिक्षा, रोजगार, नीतिगत सुधारों और सामाजिक न्याय से जुड़ी हैं। विश्वविद्यालयों में बढ़ती फीस, सरकारी नौकरियों में खाली पड़े पद, परीक्षा पद्धति की खामियां और भविष्य की अनिश्चितता ने युवाओं को सड़क पर उतार दिया है। जब वे शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए इकट्ठा हुए तो पहले मंच तोड़ दिया गया, फिर बिजली काट दी गई। अंधेरे में भी उन्होंने मोबाइल की रोशनी में अपनी बात रखी। 

लाठीचार्ज के बाद घायल साथियों को देखकर भी उनका संकल्प और मजबूत हुआ। यह दृश्य भावुक करने वाला है। यह दिखाता है कि आज का छात्र केवल डिग्री का पीछा नहीं कर रहा, वह अपने अधिकारों और देश के भविष्य के लिए लड़ रहा है। लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन का अधिकार संवैधानिक है। अनुच्छेद 19(1)(a) और (b) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण सभा का अधिकार देते हैं।

लेकिन जब प्रशासन इसे दबाने के लिए बल प्रयोग करता है तो सवाल उठता है कि क्या हम वास्तव में संवाद की संस्कृति को बढ़ावा दे रहे हैं? लाठीचार्ज से पहले वार्ता का प्रयास क्यों नहीं किया गया? क्या छात्रों की समस्याओं को गंभीरता से लिया जा रहा है या उन्हें मात्र ‘अराजक तत्व’ करार देकर खारिज किया जा रहा है? सरकार और प्रशासन को समझना चाहिए कि आज का युवा सोशल मीडिया के युग में बड़ा जागरूक है। वह सूचना पाकर सवाल पूछता है और जब जवाब नहीं मिलते तो सड़क पर उतरता है। छात्र आंदोलन की एक खूबी यह भी है कि इसमें जाति, धर्म या क्षेत्र की दीवारें टूटती दिखाई देती हैं। दिल्ली के विभिन्न विश्वविद्यालयों से आए छात्र एक मंच पर खड़े हैं। यह एकता उनकी सबसे बड़ी ताकत है। लेकिन आंदोलनकारियों को भी सावधानी बरतनी चाहिए। हिंसा, संपत्ति का नुकसान या सार्वजनिक अव्यवस्था उनके मुद्दे की विश्वसनीयता को कमजोर करती है।

शांतिपूर्ण, अनुशासित और तथ्य-आधारित विरोध ही लंबे समय तक जनसमर्थन बनाए रख सकता है। इतिहास गवाह है कि महात्मा गांधी से लेकर जयप्रकाश नारायण तक के आंदोलनों की सफलता शांति और नैतिक बल में रही।सरकार के लिए यह समय सोचने का है। युवा बेरोजगारी, शिक्षा की गुणवत्ता और कौशल विकास जैसे मुद्दों पर ठोस कदम उठाए जाएं। खाली पड़े लाखों पदों को भरा जाए, परीक्षा सुधारों पर गंभीर चर्चा हो और फीस वृद्धि पर अंकुश लगे। दमन से समस्या हल नहीं होती, संवाद से होती है।

जंतर-मंतर पर बैठे छात्रों से बातचीत का रास्ता खोला जाए। मंच तोड़ने, बिजली काटने और लाठियों के बावजूद छात्रों का जो हौसला बरकरार है, वह भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है। यह युवा ऊर्जा अगर सही दिशा मिले तो देश को नई ऊंचाइयों पर ले जा सकती है। सरकार, समाज और मीडिया को इस आवाज को दबाने के बजाय सुनना चाहिए। क्योंकि जब युवा चुप हो जाते हैं तो राष्ट्र का भविष्य अंधकारमय हो जाता है। जंतर-मंतर का यह आंदोलन सिर्फ छात्रों का नहीं, पूरे देश के चेतन का आंदोलन है। इसे कुचलने की बजाय समझने और समाधान निकालने का समय है।

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