उतरौला(बलरामपुर)। सावन मास के तीसरे सोमवार और नागपंचमी के पावन संयोग पर सोमवार को उतरौला बाजार सहित ग्रामीण क्षेत्रों में आस्था का सैलाब उमड़ पड़ा। नगर के प्रसिद्ध श्री दुःख हरण नाथ मंदिर सहित क्षेत्र के विभिन्न शिवालयों में भोर से ही श्रद्धालुओं की कतार लग गई। हाथों में पूजा की थाली, बेलपत्र, पुष्प, धतूरा, दूध और गंगाजल लिए भक्त भगवान भोलेनाथ के दर्शन एवं जलाभिषेक के लिए मंदिरों में पहुंचते रहे। मंदिर परिसर और आसपास का क्षेत्र पूरे दिन हर-हर महादेव बम-बम भोले’ के जयघोष से गूंजता रहा।
सावन का सोमवार भगवान शिव को समर्पित माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सावन मास भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है। इसी कारण इस महीने में सोमवार के दिन शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र, पुष्प, धतूरा आदि अर्पित कर भगवान शिव की आराधना करने का विशेष महत्व बताया गया है। श्रद्धालुओं ने विधि-विधान से भगवान शिव का अभिषेक कर परिवार की सुख-शांति, समृद्धि और आरोग्य की कामना की।
पौराणिक कथाओं में सावन मास का संबंध समुद्र मंथन की घटना से भी जोड़ा जाता है। मान्यता है कि देवताओं और असुरों द्वारा किए गए समुद्र मंथन से जब हलाहल विष निकला तो उसकी तीव्रता से समस्त सृष्टि संकट में पड़ गई। देवताओं और ऋषियों की प्रार्थना पर भगवान शिव ने लोककल्याण के लिए उस विष को अपने कंठ में धारण कर लिया। विष के प्रभाव को शांत करने के लिए देवताओं ने भगवान शिव का जलाभिषेक किया।
इसी पौराणिक प्रसंग की स्मृति में सावन के दौरान शिवलिंग पर जल अर्पित करने की परंपरा को विशेष धार्मिक महत्व प्राप्त हुआ। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि सावन में श्रद्धा और भक्ति से भगवान शिव का पूजन करने से मन को शांति मिलती है तथा भगवान भोलेनाथ अपने भक्तों पर कृपा बरसाते हैं।
इसी दिन नागपंचमी का पर्व होने से धार्मिक उत्साह और भी बढ़ गया। नागपंचमी हिंदू परंपरा में नाग देवताओं की पूजा-अर्चना का महत्वपूर्ण पर्व है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार नागों का संबंध भगवान शिव से भी है। भगवान शिव के गले में विराजमान नाग उनकी वैराग्य, निर्भयता और प्रकृति के प्रति संतुलन की भावना का प्रतीक माना जाता है।
पौराणिक कथाओं में शेषनाग, वासुकि, तक्षक, कर्कोटक और पद्म सहित अनेक नागों का उल्लेख मिलता है। समुद्र मंथन में वासुकि नाग को मंदराचल पर्वत के चारों ओर लपेटकर मंथन की रस्सी के रूप में प्रयोग किए जाने की कथा प्रसिद्ध है। वहीं भगवान विष्णु के शेषनाग पर शयन करने तथा भगवान शिव के गले में नाग के विराजमान होने का उल्लेख धार्मिक ग्रंथों में मिलता है। इसी कारण नागपंचमी पर नाग देवता के पूजन को भगवान शिव की आराधना से भी जोड़कर देखा जाता है।
श्रद्धालुओं ने नागपंचमी के अवसर पर नाग देवता का पूजन कर दूध, पुष्प और अक्षत अर्पित किए तथा परिवार की सुख-समृद्धि, सुरक्षा और कल्याण की प्रार्थना की। ग्रामीण क्षेत्रों में भी नागपंचमी को लेकर विशेष धार्मिक उत्साह देखने को मिला।
नागपंचमी से जुड़ी धार्मिक कथाओं में भगवान श्रीकृष्ण और कालिया नाग का प्रसंग भी विशेष रूप से उल्लेखनीय है। मान्यता के अनुसार वृंदावन के यमुना क्षेत्र में कालिया नाग के विष से जल दूषित हो गया था। बाल रूप में भगवान श्रीकृष्ण ने कालिया नाग का दमन कर यमुना को उसके विष से मुक्त कराया। इस प्रसंग को बुराई पर अच्छाई की विजय और प्रकृति के संरक्षण के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है।
सावन के तीसरे सोमवार और नागपंचमी का एक साथ पड़ना श्रद्धालुओं के लिए विशेष धार्मिक अवसर बन गया। एक ओर जहां भक्तों ने भगवान शिव का जलाभिषेक कर बेलपत्र, धतूरा और पुष्प अर्पित किए, वहीं दूसरी ओर नाग देवता की पूजा कर परिवार के मंगल और सुरक्षा की कामना की।
श्री दुःख हरण नाथ मंदिर सहित विभिन्न शिव मंदिरों में दिनभर श्रद्धालुओं का आवागमन बना रहा। मंदिरों में पूजा-अर्चना के साथ भजन-कीर्तन और धार्मिक जयघोष होते रहे। कई श्रद्धालु सुबह से ही व्रत रखकर मंदिर पहुंचे और भगवान शिव के दर्शन के बाद पूजा-अर्चना की।
श्रद्धालुओं का कहना था कि सावन में भगवान शिव की आराधना करने से मन को आध्यात्मिक शांति मिलती है। वहीं नागपंचमी प्रकृति और जीव-जंतुओं के प्रति सम्मान तथा सह-अस्तित्व की भारतीय परंपरा का संदेश देती है।
उतरौला नगर से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों तक पूरे दिन धार्मिक वातावरण बना रहा। मंदिरों में उमड़ी भीड़, शिवलिंग पर चढ़ता जल, बेलपत्र और पुष्प तथा गूंजते हर-हर महादेव के जयकारों ने पूरे क्षेत्र को भक्तिमय बना दिया। सावन के तीसरे सोमवार और नागपंचमी के इस विशेष संयोग ने एक बार फिर सनातन परंपराओं, पौराणिक मान्यताओं और लोक आस्था की गहरी जड़ों को प्रदर्शित किया। दिनभर मंदिरों और धार्मिक स्थलों पर श्रद्धालुओं की आवाजाही बनी रही और पूरे क्षेत्र में आस्था, भक्ति और आध्यात्मिक उल्लास का वातावरण कायम रहा।












