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बस्ती जिले के बहादुरपुर ब्लॉक स्थित मनोरमा नदी तट पर शुक्रवार दोपहर 1:30 बजे ‘महुआ डाबर जनसंहार स्मृति दिवस’ भावपूर्ण माहौल में मनाया गया। इस अवसर पर 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के हजारों ज्ञात-अज्ञात शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की गई। वक्ताओं ने 169 वर्ष बाद भी महुआ डाबर के शहीदों को उचित सम्मान न मिलने पर चिंता व्यक्त करते हुए न्याय की मांग दोहराई। इतिहासकारों के अनुसार, 3 जुलाई 1857 को अंग्रेजी सेना ने महुआ डाबर गांव को तीनों ओर से घेर लिया था। इस दौरान हजारों निर्दोष स्त्री, पुरुष, बुजुर्ग और बच्चों का निर्मम नरसंहार किया गया। इसके बाद पूरे गांव को आग के हवाले कर उसे ‘गैरचिरागी’ घोषित कर राजस्व अभिलेखों से उसका नाम हटा दिया गया था। महुआ डाबर संग्रहालय के निदेशक और शहीद जफर अली के वंशज डॉ. शाह आलम राना ने बताया कि 1857 की क्रांति का यह सबसे बड़ा जनसंहार इतिहास के पन्नों में उपेक्षित है। उन्होंने कहा कि महुआ डाबर की शहादत संख्या और क्रूरता दोनों में जलियांवाला बाग से बड़ी थी, लेकिन आज भी इसका समुचित उल्लेख पाठ्यपुस्तकों में नहीं है। डॉ. राना ने केंद्र सरकार से 3 जुलाई को ‘महुआ डाबर बलिदान दिवस’ घोषित करने की मांग की। उन्होंने 10 एकड़ में भव्य शहीद स्मारक, शहादत कॉरिडोर, लाइट एंड साउंड शो तथा संग्रहालय विकसित करने की भी अपील की। इसके अतिरिक्त, यूपी बोर्ड और एनसीईआरटी की इतिहास की पुस्तकों में महुआ डाबर जनसंहार को शामिल करने, ब्रिटिश सरकार से आधिकारिक माफी और लूटी गई धरोहरों की वापसी सुनिश्चित कराने की भी मांग उठाई गई। वक्ताओं ने इस बात पर भी जोर दिया कि उत्तर प्रदेश पर्यटन नीति 2022 के तहत स्वतंत्रता संग्राम सर्किट में शामिल होने और स्मारक निर्माण की घोषणा के बावजूद चार वर्ष बीत जाने पर भी काम शुरू नहीं हुआ है। स्थानीय लोगों ने सरकार से शहीदों के सम्मान में किए गए वादों को शीघ्र पूरा करने का आग्रह किया।
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महुआ डाबर जनसंहार स्मृति दिवस मनाया गया:169 साल बाद भी शहीदों को राष्ट्रीय सम्मान की मांग
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