गाज़ियाबाद। नीट पेपर लीक के विरोध में युवा कांग्रेस द्वारा किया गया हालिया प्रदर्शन गाज़ियाबाद की राजनीति में कई बड़े सवाल छोड़ गया। एक तरफ युवा कांग्रेस जिलाध्यक्ष आसिफ सैफी और प्रदेश सचिव इमरान मलिक के नेतृत्व में कार्यकर्ता सड़क पर उतरकर सरकार के खिलाफ हुंकार भरते दिखाई दिए, तो दूसरी ओर कांग्रेस संगठन के भीतर चल रही गुटबाजी ने पार्टी की अंदरूनी हालत को भी उजागर कर दिया।
प्रदर्शन ने यह साबित किया कि कांग्रेस में आज भी ऐसे युवा चेहरे मौजूद हैं जो संघर्ष की राजनीति को जिंदा रखना चाहते हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या संगठन के भीतर बैठे कुछ लोग ही कांग्रेस की जड़ों को खोखला करने में जुटे हैं?
एक जिले में दो-दो नेतृत्व केंद्र, आखिर किसके फायदे की राजनीति?
राजनीतिक हलकों में सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की है कि आखिर गाज़ियाबाद युवा कांग्रेस में दो-दो नेतृत्व केंद्र क्यों बनाए गए?
एक ओर निर्वाचित जिलाध्यक्ष आसिफ सैफी हैं, जो लगातार धरना-प्रदर्शन और जनसरोकार के मुद्दों पर सक्रिय दिखाई दे रहे हैं, तो दूसरी ओर ‘नियुक्त नेतृत्व’ भी संगठन में समानांतर शक्ति केंद्र बनाने में लगा हुआ है।
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि किसी भी संगठन में जब समानांतर नेतृत्व खड़ा किया जाता है, तो उसका सीधा असर कार्यकर्ताओं के मनोबल और संगठन की एकजुटता पर पड़ता है। यही वजह है कि कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच अब खुलकर यह सवाल उठने लगे हैं कि आखिर यह प्रयोग किसके इशारे पर किया जा रहा है?
मैदान में संघर्ष करने वाले बनाम एसी कमरों की राजनीति
नीट पेपर लीक जैसे संवेदनशील मुद्दे पर जब युवा कांग्रेस कार्यकर्ता सड़कों पर संघर्ष कर रहे थे, तब संगठन के भीतर बैठे कुछ नेता केवल राजनीतिक गणित साधने में व्यस्त दिखाई दिए।
गाज़ियाबाद कांग्रेस में लंबे समय से यह चर्चा है कि ज़मीनी कार्यकर्ताओं को आगे बढ़ाने के बजाय कुछ बड़े पदों पर बैठे लोग केवल अपने करीबी चेहरों को स्थापित करने की राजनीति कर रहे हैं। लेकिन हालिया प्रदर्शन ने यह साफ कर दिया कि जनता और कार्यकर्ता अब केवल पद नहीं, बल्कि काम देखने लगे हैं। यही कारण है कि ‘काम बोलता है’ की तर्ज पर आसिफ सैफी की सक्रियता और नेतृत्व क्षमता चर्चा के केंद्र में आ गई है।
गलत रिपोर्टिंग और अंदरूनी खींचतान से कमजोर हो रही पार्टी
कांग्रेस के भीतर अब यह आरोप भी तेज होने लगे हैं कि कुछ नेता शीर्ष नेतृत्व तक जिले की गलत तस्वीर पेश कर रहे हैं। संगठन को मजबूत करने के बजाय गुटबाजी को बढ़ावा देना और सक्रिय कार्यकर्ताओं को किनारे लगाने की कोशिशें लगातार पार्टी को नुकसान पहुंचा रही हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यही स्थिति जारी रही, तो गाज़ियाबाद में कांग्रेस का जनाधार और कमजोर हो सकता है। क्योंकि जनता उन नेताओं को पहचानने लगी है जो केवल पद की राजनीति करते हैं और उन लोगों को भी जो सड़क पर संघर्ष करते दिखाई देते हैं।
कांग्रेस हाईकमान के लिए चेतावनी बनता गाज़ियाबाद मॉडल
गाज़ियाबाद का मौजूदा घटनाक्रम कांग्रेस नेतृत्व के लिए किसी चेतावनी से कम नहीं माना जा रहा। पार्टी के भीतर अब यह आवाज उठने लगी है कि यदि समय रहते संगठन में पारदर्शिता और एकजुटता नहीं लाई गई, तो कांग्रेस का नुकसान तय है।
नीट पेपर लीक आंदोलन ने यह जरूर साबित कर दिया कि कांग्रेस के पास संघर्ष करने वाले युवा चेहरे मौजूद हैं, लेकिन यदि उन्हीं चेहरों को अंदरूनी राजनीति का शिकार बनाया गया, तो आने वाले समय में पार्टी के लिए हालात और चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं।
- सवाल अब भी कायम है…क्या गाज़ियाबाद कांग्रेस में संघर्ष करने वालों को आगे बढ़ाया जाएगा?
- क्या गुटबाजी खत्म कर संगठन को एकजुट किया जाएगा?
- या फिर अंदरूनी राजनीति की भेंट चढ़कर कांग्रेस खुद अपने ही जनाधार को कमजोर करती रहेगी?
फिलहाल, नीट पेपर लीक विरोध प्रदर्शन ने इतना जरूर साबित कर दिया है कि गाज़ियाबाद में कांग्रेस की लड़ाई अब सिर्फ सरकार से नहीं, बल्कि संगठन के भीतर की राजनीति से भी है।












