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सरगुजिहा भाषा, बच्चे को प्रवेश से इनकार करना निजी स्कूल प्रबंधन को पड़ा भारी, जुर्माना

अंबिकापुर। सरगुजिहा भाषा बोलने और आर्थिक पृष्ठभूमि का हवाला देकर एक चार वर्षीय बच्चे को विद्यालय में प्रवेश देने से इनकार करना निजी स्कूल प्रबंधन को भारी पड़ गया है।

मामला अंबिकापुर के चोपड़ापारा स्थित स्वरंग किड्स एकेडमी (पेशागी एजूकेशन सोसायटी) का है, जहाँ भाषा के आधार पर किए गए भेदभाव ने प्रशासन को कड़ी कार्रवाई के लिए मजबूर कर दिया।

सोशल मीडिया और न्यूज चैनलों के माध्यम से मामला सामने आने के बाद सरगुजा कलेक्टर अजीत वसंत ने इसे गंभीरता से लेते हुए तत्काल जांच के निर्देश दिए थे।

जांच में यह स्पष्ट हुआ कि स्कूल प्रबंधन ने मासूम बच्चे को सिर्फ इसलिए दाखिला देने से मना कर दिया था क्योंकि वह हिंदी में बात नहीं कर पाता था और स्थानीय सरगुजिहा बोली का प्रयोग करता था।

इतना ही नहीं, संस्था द्वारा बच्चे के पिता से यह आपत्तिजनक टिप्पणी भी की गई कि विद्यालय में ‘बड़े घरों’ के बच्चे पढ़ते हैं और शिक्षक बच्चे की भाषा नहीं समझ पा रहे हैं, इसलिए उसे प्रवेश नहीं दिया जा सकता।

जिला शिक्षा अधिकारी डॉ. दिनेश कुमार झा के निर्देश पर रूमी घोष, वरिष्ठ प्राचार्य, शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय केदारपुर की अध्यक्षता में गठित जांच दल ने पूरे प्रकरण की पड़ताल की।

जांच में न केवल भाषा के आधार पर भेदभाव की पुष्टि हुई, बल्कि यह चौंकाने वाला तथ्य भी सामने आया कि यह संस्था बिना किसी विभागीय मान्यता के संचालित हो रही थी। विद्यालय प्रबंधन ने भी अपनी गलती को स्वीकार कर लिया है।

प्रशासन ने इस कृत्य को राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और ‘निःशुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009’ का सीधा उल्लंघन माना है।

इसके परिणामस्वरूप, उक्त अधिनियम की धारा-18 (5) के तहत प्रदत्त शक्तियों का उपयोग करते हुए जिला शिक्षा अधिकारी ने स्वरंग किड्स एकेडमी पर 1,00,000 रुपये (एक लाख रुपये) का आर्थिक दंड अधिरोपित किया है। साथ ही, अगले आदेश तक संस्था का संचालन तत्काल प्रभाव से स्थगित कर दिया गया है।

विद्यालय प्रबंधन को निर्देशित किया गया है कि दंड की राशि शासन के खजाने में चालान के माध्यम से जमा कर उसकी प्रति प्रस्तुत करें। वहीं, छात्रों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए, अम्बिकापुर के विकासखण्ड शिक्षा अधिकारी को निर्देश दिए गए हैं कि वे स्कूल में अध्ययनरत बच्चों के पालकों से संपर्क स्थापित करें और बच्चों को अन्य उपयुक्त विद्यालयों में प्रवेश दिलाना सुनिश्चित करें।

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