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भारतीय अंतरिक्ष में निजी क्षेत्र की ऊंची उड़ान – महेन्द्र तिवारी

  • स्काईरूट एयरोस्पेस का विक्रम-1: भारतीय अंतरिक्ष क्षेत्र की नई उड़ान

भारत के अंतरिक्ष अन्वेषण के इतिहास में 18 जुलाई का दिन एक ऐसे स्वर्णिम अध्याय के रूप में दर्ज होने जा रहा है जो देश की वैज्ञानिक और तकनीकी यात्रा की दिशा को हमेशा के लिए बदल देगा। श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से भारतीय स्पेस टेक स्टार्टअप स्काईरूट एयरोस्पेस का स्वदेशी रूप से विकसित विक्रम-1 रॉकेट अपनी पहली कक्षीय उड़ान भरने के लिए पूरी तरह तैयार है। 

यह केवल एक रॉकेट का प्रक्षेपण नहीं है बल्कि यह उस नए और आत्मनिर्भर भारत का उद्घोष है जहाँ निजी क्षेत्र अब अंतरिक्ष की अनंत गहराइयों को नापने के लिए पूरी तरह से सक्षम हो चुका है। दशकों तक भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम पूर्ण रूप से सरकारी नियंत्रण और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो के कुशल मार्गदर्शन में पलता और बढ़ता रहा है।

इसरो ने सीमित संसाधनों के बावजूद दुनिया को अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है और मंगल ग्रह से लेकर चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव तक तिरंगा फहराया है। लेकिन अब समय बदल रहा है और वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में भारत की हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए निजी क्षेत्र की भागीदारी अनिवार्य हो गई है। 

इसी आवश्यकता को समझते हुए भारत सरकार ने अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोलने का जो ऐतिहासिक निर्णय लिया था यह प्रक्षेपण उसी नीतिगत बदलाव का सबसे बड़ा और प्रत्यक्ष परिणाम है। जब हम स्काईरूट एयरोस्पेस और उसके महत्वाकांक्षी रॉकेट विक्रम-1 की बात करते हैं तो हमें इसके पीछे के तकनीकी चमत्कार और वर्षों की अथक मेहनत को समझना होगा। इस रॉकेट का नाम भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक डॉ विक्रम साराभाई के सम्मान में रखा गया है जो अपने आप में एक बहुत बड़ा प्रतीकात्मक संदेश है। विक्रम-1 कोई साधारण लॉन्च वाहन नहीं है बल्कि यह अत्याधुनिक तकनीकों का एक अद्भुत संगम है। 

इस रॉकेट की सबसे बड़ी विशेषता इसके निर्माण में थ्रीडी प्रिंटिंग तकनीक का व्यापक उपयोग है। इसके कई महत्वपूर्ण पुर्जे और विशेष रूप से इसका क्रायोजेनिक इंजन जिसे धवन नाम दिया गया है पूरी तरह से थ्रीडी प्रिंटेड है। पारंपरिक निर्माण विधियों की तुलना में थ्रीडी प्रिंटिंग से रॉकेट के पुर्जे बनाने में लगने वाला समय और लागत दोनों काफी कम हो जाते हैं। 

इसके अतिरिक्त रॉकेट का बाहरी ढांचा कार्बन फाइबर कंपोजिट से बनाया गया है जो इसे बेहद हल्का लेकिन इस्पात से भी अधिक मजबूत बनाता है। एक हल्के ढांचे का सीधा अर्थ यह है कि रॉकेट अपने साथ अधिक पेलोड यानी अधिक वजन के उपग्रह ले जाने में सक्षम होगा। यह एक बहु चरण वाला रॉकेट है जिसे विशेष रूप से छोटे उपग्रहों को पृथ्वी की निचली कक्षा में स्थापित करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।

 अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में उप कक्षीय और कक्षीय उड़ानों के बीच एक बहुत बड़ा तकनीकी अंतर होता है जिसे समझना यहां बेहद प्रासंगिक है। नवंबर 2022 में स्काईरूट एयरोस्पेस ने ही अपना पहला रॉकेट विक्रम एस लॉन्च किया था जो एक उप कक्षीय उड़ान थी। उप कक्षीय उड़ान का अर्थ होता है कि रॉकेट अंतरिक्ष की सीमा को तो छूता है लेकिन वह पृथ्वी की परिक्रमा करने के लिए आवश्यक गति प्राप्त नहीं कर पाता और गुरुत्वाकर्षण के कारण वापस लौट आता है। इसके विपरीत अठारह जुलाई को होने वाला विक्रम-1 का प्रक्षेपण एक कक्षीय मिशन है। 

इसका मतलब है कि यह रॉकेट न केवल अंतरिक्ष में जाएगा बल्कि यह इतनी तेज गति प्राप्त करेगा कि यह पृथ्वी की कक्षा में स्थापित हो सके और अपने साथ ले जाए गए उपग्रहों को सटीक रूप से उनकी निर्धारित जगह पर छोड़ सके। कक्षीय उड़ान तकनीकी रूप से बहुत अधिक जटिल चुनौतीपूर्ण और जोखिम भरी होती है। इसमें रॉकेट के इंजनों को कई बार चालू और बंद करना पड़ता है और इसकी नेविगेशन प्रणाली को बिल्कुल अचूक होना पड़ता है। अगर स्काईरूट की टीम इस चुनौती को सफलतापूर्वक पार कर लेती है तो यह भारतीय निजी क्षेत्र की तकनीकी क्षमता का विश्व स्तर पर सबसे बड़ा प्रमाण होगा।

 आर्थिक और रणनीतिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो इस प्रक्षेपण के मायने बहुत गहरे और दूरगामी हैं। आज पूरी दुनिया में संचार मौसम पूर्वानुमान कृषि निगरानी और नेविगेशन के लिए छोटे उपग्रहों की मांग में बेतहाशा वृद्धि हो रही है। पारंपरिक रूप से बड़े रॉकेटों के जरिए इन उपग्रहों को लॉन्च करने में बहुत समय लगता है क्योंकि सरकारी एजेंसियों के पास अपने स्वयं के बड़े मिशन होते हैं और छोटे उपग्रहों को उन बड़े मिशनों के साथ सह यात्री के रूप में भेजा जाता है। इस प्रक्रिया में कई बार निजी कंपनियों और विश्वविद्यालयों को अपने उपग्रह लॉन्च करने के लिए वर्षों तक इंतजार करना पड़ता है। स्काईरूट जैसी कंपनियां इसी समस्या का समाधान लेकर आई हैं। 

विक्रम-1 जैसे रॉकेट ऑन डिमांड लॉन्च की सुविधा प्रदान करते हैं। इसका मतलब है कि जब भी किसी ग्राहक को अपना उपग्रह लॉन्च करना हो यह रॉकेट कुछ ही हफ्तों की तैयारी के साथ उड़ान भरने के लिए तैयार हो सकता है। यह लचीलापन और कम लागत भारतीय अंतरिक्ष उद्योग को वैश्विक कमर्शियल मार्केट में एक बहुत बड़ा प्रतिस्पर्धी लाभ प्रदान करेगा। वर्तमान में वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में भारत की हिस्सेदारी बहुत कम है लेकिन विक्रम-1 की सफलता इस हिस्सेदारी को कई गुना बढ़ाने का मार्ग प्रशस्त करेगी और एलन मस्क की स्पेसएक्स जैसी दिग्गज अंतरराष्ट्रीय कंपनियों को सीधे चुनौती देने की नींव रखेगी।

 इस निजीकरण और तकनीकी विकास का एक और महत्वपूर्ण पहलू रोजगार सृजन और प्रतिभा पलायन को रोकना है। भारत में एयरोस्पेस इंजीनियरिंग डीप टेक और उन्नत विनिर्माण के क्षेत्र में प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है। लेकिन अतीत में उचित अवसर और निजी क्षेत्र में निवेश न होने के कारण हमारी कई बेहतरीन प्रतिभाएं विदेशों का रुख कर लेती थीं। स्काईरूट एयरोस्पेस जैसी स्वदेशी कंपनियों का उदय इन युवा इंजीनियरों और वैज्ञानिकों को अपने ही देश में विश्व स्तरीय परियोजनाओं पर काम करने का अवसर दे रहा है। इससे न केवल देश में एक मजबूत अंतरिक्ष इकोसिस्टम तैयार हो रहा है बल्कि सहायक उद्योगों को भी भारी बढ़ावा मिल रहा है। 

रॉकेट निर्माण के लिए आवश्यक कल पुर्जे सॉफ्टवेयर विकास परीक्षण सुविधाएं और ग्राउंड स्टेशन ऑपरेशंस जैसे क्षेत्रों में हजारों नए रोजगार पैदा हो रहे हैं। यह पूरी प्रक्रिया मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत के सपनों को सही मायनों में साकार कर रही है। सरकार द्वारा स्थापित नोडल एजेंसी इन स्पेस का समर्थन और इसरो द्वारा प्रदान की जा रही तकनीकी और बुनियादी ढांचागत सहायता यह दर्शाती है कि भारत में अब सार्वजनिक और निजी क्षेत्र एक दूसरे के प्रतिस्पर्धी नहीं बल्कि एक दूसरे के पूरक बनकर काम कर रहे हैं।

विक्रम-1 की उड़ान केवल एक कंपनी की व्यावसायिक सफलता तक सीमित नहीं है बल्कि यह पूरे देश की उम्मीदों और आकांक्षाओं का प्रतीक है। यह उड़ान उन तमाम छोटे और मझोले स्टार्टअप्स के लिए एक प्रेरणा है जो नवाचार के क्षेत्र में कुछ नया करने का सपना देखते हैं। जब एक निजी भारतीय कंपनी अपने दम पर एक कक्षीय रॉकेट बनाकर उसे अंतरिक्ष में भेज सकती है तो यह साबित होता है कि दृढ़ इच्छाशक्ति और सही नीतिगत समर्थन के साथ कोई भी लक्ष्य हासिल किया जा सकता है। आने वाले वर्षों में हम अंतरिक्ष पर्यटन क्षुद्रग्रह खनन और गहरे अंतरिक्ष मिशनों में भी भारतीय निजी क्षेत्र की सक्रिय भागीदारी देखेंगे। 

विक्रम-1 उस लंबी यात्रा का केवल पहला कदम है। अठारह जुलाई को जब विक्रम-1 के इंजन आग उगलते हुए आसमान का सीना चीरेंगे तो वह केवल एक मशीन की उड़ान नहीं होगी बल्कि वह एक नए भारत के आत्मविश्वास की उड़ान होगी। एक ऐसा भारत जो अब केवल दूसरों के बनाए रास्तों पर चलने में विश्वास नहीं रखता बल्कि अंतरिक्ष के अनंत विस्तार में अपना खुद का रास्ता बनाने का साहस रखता है। यह प्रक्षेपण आने वाली पीढ़ियों को यह याद दिलाएगा कि जब सपने बड़े होते हैं और हौसले बुलंद होते हैं तो आसमान की कोई सीमा नहीं होती और सितारे भी हमारी पहुंच में होते हैं।

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