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सातवां वेतनमान अटका, पेंशन को तरसे बुजुर्ग, पूर्व मत्स्य निदेशक की कार्यशैली पर सवाल

  • 30 से 36 वर्ष सेवा देने वाले कर्मियों को न पेंशन, न सेवानिवृत्ति लाभ
  • सातवें वेतनमान पर विलंब का जिम्मेदार कौन, निदेशालय पर उठे सवाल

प्रतापगढ। केंद्र और प्रदेश सरकार जहां वरिष्ठ नागरिकों तथा कर्मचारियों के कल्याण के लिए लगातार योजनाएं लागू करने का दावा कर रही हैं, वहीं उत्तर प्रदेश मत्स्य पालक विकास अभिकरण के लगभग 100 सेवानिवृत्त कर्मचारी वर्षों से अपने अधिकारों के लिए भटकने को मजबूर हैं। सातवें वेतनमान, पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभों से वंचित इन बुजुर्ग कर्मियों की स्थिति ऐसी हो गई है कि कई परिवार आर्थिक संकट और भुखमरी के कगार पर पहुंच गए हैं।

शासन की स्पष्ट संस्तुतियों और उपलब्ध अभिलेखों के बावजूद उन्हें उनके वैधानिक अधिकारों से वंचित रखा गया, जिसके कारण अनेक परिवार आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं। जानकारी के अनुसार मत्स्य विभाग के नियंत्रणाधीन 19 जनपदों में संचालित मत्स्य पालक विकास अभिकरण के कर्मचारी 30 से 36 वर्षों तक सेवा देने के बाद सेवानिवृत्त हुए। सेवा काल में उन्हें पांचवें और छठे वेतन आयोग का लाभ तो दिया गया, लेकिन एक जनवरी 2016 से देय सातवें वेतनमान का लाभ आज तक नहीं मिल सका। इसके साथ ही बड़ी संख्या में कर्मचारियों को ग्रेच्युटी, अवकाश नगदीकरण और नियमित पेंशन जैसे सेवानिवृत्ति लाभ भी नहीं मिल पाए हैं।

मामले की गंभीरता इस तथ्य से समझी जा सकती है कि उत्तर प्रदेश शासन, वित्त (वेतन आयोग) अनुभाग-2 के पत्र संख्या 64/2016, वे०अ०-2645/10-04(एम), दिनांक 16 दिसंबर 2016 के संकल्प पत्र में अभिकरण कर्मियों को समान वेतनमान का लाभ दिए जाने की संस्तुति की गई थी। इसके अतिरिक्त 19 जनपदों की गवर्निंग बॉडी द्वारा भी समय-समय पर सातवें वेतनमान के पक्ष में प्रस्ताव पारित कर निदेशालय को भेजे गए थे। इसके बावजूद मामला वर्षों तक लंबित बना रहा। 

सेवानिवृत्त कर्मचारियों का आरोप है कि तत्कालीन मत्स्य निदेशक एस.के. सिंह के कार्यकाल में इस प्रकरण पर अपेक्षित निर्णय नहीं लिया गया। आरोपों के अनुसार शासन स्तर पर जानकारी मांगे जाने पर निदेशालय द्वारा कार्यालय पत्रांक 1099/स्थापना-शा./संविलीन, दिनांक 21 मई 2020 जारी कर 19 जनपदों के मुख्य कार्यकारी अधिकारियों से यह विवरण मांगा गया कि सातवां वेतनमान लागू होने पर कितना अतिरिक्त व्यय भार आएगा। 

कर्मचारियों का कहना है कि यह प्रक्रिया केवल पत्राचार तक सीमित रही और इसके आधार पर शासन को यह संदेश देने का प्रयास किया जाता रहा कि प्रकरण पर कार्रवाई जारी है। करीब दस माह पूर्व कुछ सेवानिवृत्त कर्मचारियों ने लखनऊ स्थित सचिवालय पहुंचकर वित्त विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को अपनी व्यथा बताई। इसके बाद वित्त अनुभाग ने मानवीय आधार पर सातवें वेतनमान संबंधी पत्रावली पर कार्रवाई शुरू की। सूत्रों के अनुसार वित्त अनुभाग और वित्त नियंत्रक स्तर पर आवश्यक प्रक्रिया लगभग पूरी कर ली गई है। हालांकि अंतिम निर्णय से पहले शासन ने मत्स्य निदेशालय से यह जानकारी मांगी है कि सातवें वेतनमान के क्रियान्वयन में विलंब किस स्तर पर हुआ और इसके लिए कौन जिम्मेदार है।

बताया जाता है कि शासन द्वारा मांगी गई सूचना अभी तक पूरी तरह उपलब्ध नहीं कराई जा सकी है। इस कारण सचिवालय को अनुस्मारक भी भेजना पड़ा। कर्मचारियों का आरोप है कि मामले को अनावश्यक रूप से लंबा खींचा जा रहा है और वास्तविक जिम्मेदारों को बचाने का प्रयास हो रहा है। दूसरी ओर यह भी चर्चा है कि पूरे प्रकरण की जिम्मेदारी निचले स्तर के कर्मचारियों या पटल प्रभारी पर डालने की कोशिश की जा सकती है।

फिलहाल मत्स्य निदेशालय में आईएएस अधिकारी धनलक्ष्मी महानिदेशक के पद पर कार्यरत हैं। सेवानिवृत्त कर्मचारियों को उम्मीद है कि उनके नेतृत्व में वर्षों से लंबित यह मामला निष्पक्ष ढंग से निस्तारित होगा। अब निगाहें शासन और निदेशालय की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं, क्योंकि सौ से अधिक परिवारों को सातवें वेतनमान, पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभों का इंतजार है। कर्मचारियों का कहना है कि देर से ही सही, लेकिन उन्हें विश्वास है कि अंतत: न्याय की जीत होगी।

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