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8 दशक का सबसे बड़ा संकट, क्या ईरान की वजह से थम जाएगा पूरा यूरोप?

यूरोप की एयरलाइंस भीषण ईंधन संकट से जूझ रही हैं। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर ईरानी की कड़ी नाकेबंदी के कारण खाड़ी देशों से जेट ईंधन नहीं पहुंच पा रहा है। अगर कोई रास्ता जल्द नहीं निकलता है तो कुछ हफ्ते में ही पूरे यूरोप की एयरलाइनों को अपनी सेवा ठप करनी पड़ सकती है। जर्मनी की लुफ्थांसा एयरलाइंस ने युद्ध के कारण अक्टूबर तक करीब 20 उड़ानों की कटौती की है।

कंपनी ने पिछले हफ्ते अपनी सहायक ‘सिटीलाइन’ को भी बंद कर दिया है। इसके अलावा कंपनी लुफ्थांसा एयरलाइन, ऑस्ट्रियन एयरलाइन, ब्रसेल्स एयरलाइन, स्विस और आईटीए एयरवेज का विलय भी कर रही है। 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ईरान पर हमला किया था। इसके बाद से ही कई देश जेट ईंधन की कमी का सामना कर रहे हैं। कीमतें भी दोगुना से अधिक हो गई हैं। कई कंपनियों ने विभिन्न रूटों पर अलग-अलग ईंधन अधिभार लगा दिए हैं। नतीजा यह है कि लोगों को महंगी यात्रा करनी पड़ रही है।

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अकेले यूरोप में लंबी दूरी की यात्रा करने पर करीब 103 डॉलल और यूरोप के भीतर की फ्लाइट में करीब 33 डॉलर अधिक चुकाना पड़ रहा है। गर्मियों में बड़ी संख्या में लोग यूरोप की यात्रा पर जाते हैं। वहीं यूरोपीय लोग भी अन्य देश जाते हैं। ऐसे मौसम में ईंधन की कमी से पर्यटन को झटका लगेगा। मजबूरन फ्यूल राशनिंग और फ्लाइट कैंसिल करने जैसे फैसले सरकारों और एयरलाइनों को लेने पड़ रहे हैं।

कितना बड़ा है जेट ईंधन संकट?

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के कार्यकारी निदेशक फातिह बिरोल का कहना है कि यूरोप के पास शायद 6 हफ्ते का जेट ईंधन बचा है। यह अब तक का सबसे बड़ा ऊर्जा संकट है। अगर आगे भी आपूर्ति बाधित रहती है तो उड़ानों को रद्द भी किया जा सकता है।

अरब न्यूज से बातचीत में रायस्टैड एनर्जी के मुख्य अर्थशास्त्री क्लाउडियो गैलिम्बर्टी ने इसे आठ दशक का सबसे गंभीर ऊर्जा संकट करार दिया। उनका कहना है कि यूरोप के एयरपोर्ट पर ईंधन की भीषण कमी होने में पांच से सात हफ्ते का समय लग सकता है। अगर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खुल भी गया तो तुरंत कोई राहत नहीं मिलेगी।

किन-किन देशों पर निर्भर है यूरोप

यूरोपीय संघ को करीब एक तिहाई जेट ईंधन और दो तिहाई कच्चा तेल आयात से हासिल होता है। मगर ईरान युद्ध के कारण यह सप्लाई लाइन पूरी तरह से ठप हो चुकी है। ट्रांसपोर्ट एंड एनवायरनमेंट के मुताबिक यूरोप के जेट ईंधन आयात का करीब 30 फीसद हिस्सा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते आता है। 2024 के आंकड़ों के मुताबिक यूरोप अपना करीब 95 फीसद जेट फ्यूल दूसरे देशों से खरीदता है।

यूरोप को तैयार जेट फ्यूल बेचने वाले देश

  • कुवैत: 11%
  • यूएई: 5%
  • भारत: 5%
  • सऊदी अरब: 3%
  • दक्षिण कोरिया: 2%
  • चीन: 2%
  • मिस्र: 2%
  • अन्य: 6%

कच्चा तेल बेचने वाले देश: यूरोप कुछ देशों से कच्चा तेल खरीदता है। इसके बाद अपने यहां रिफाइन करता है। इससे जेट फ्यूल समेत अन्य पेट्रोलियम प्रोडक्ट तैयार किए जाते हैं। इन देशों से भी उतनी आपूर्ति नहीं हो पा रही है, जितनी यूरोप को जरूरत है।

  • अमेरिका: 10%
  • नॉर्वे: 7%
  • कजाखस्तान: 7%
  • सऊदी अरब: 5%
  • लीबिया: 5%
  • नाइजीरिया: 4%
  • इराक: 4%
  • यूके: 3%
  • अजरबैजान: 3%
  • ब्राजील: 3%
  • यूरोपीय यूनियन: 3%
  • अन्य देश: 13%

इन यूरोपीय देशों पर अधिक संकट

नाटो के सबसे बड़े पेट्रोलियम नेटवर्क सेंट्रल यूरोप पाइपलाइन सिस्टम से मध्य और उत्तरी यूरोप को कुछ ईंधन की आपूर्ति होती है। यह पाइपलाइन करीब 5300 किमी लंबी है। इसके माध्यम से नीदरलैंड, फ्रांस, जर्मनी, बेल्जियम तक आपूर्ति होती है। दूसरी तरफ इटली, ग्रीस और स्पेन जैसे देश टैंकरों से होने वाली आपूर्ति पर काफी हद तक निर्भर हैं। यही कारण है कि इटली राशनिंग लगाने वाला पहला यूरोपीय देश बन गया है।

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लुफ्थांसा का कहना है कि वह 21 अप्रैल से 20 हजार कम छोटी दूरी की उड़ान ऑपरेट करेगी। इससे करीब 40 हजार टन ईंधन की बचत होगी। लुफ्थांसा के अलावा एसएएस और केएलएम जैसी एयरलाइंस ने भी यूरोप के अंदर अपनी फ्लाइट में कटौती की है।

अगर वैकल्पिक आपूर्ति व्यवस्था तुरंत से सुनिश्चित नहीं की जाती है तो यूरोप के पास केवल 6 सप्ताह का ही जेट ईंधन का भंडार बचेगा। इस स्थिति से बड़े पैमाने पर उड़ानें रद्द हो सकती हैं। किराए में इजाफा हो सकता है और लाखों यात्रियों को गर्मियों की यात्रा में व्यवधान का सामना करना पड़ सकता है। – अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी

अमेरिका से फ्यूल खरीदने पर विचार

हाल ही में यूरोपीय संघ के परिवहन मंत्रियों ने वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से बैठक की। यूरोपीय संघ के परिवहन आयुक्त अपोस्टोलोस त्ज़ित्ज़िकोस्टास ने बताया कि हम यूरोप के लिए वैकल्पिक जेट ईंधन आपूर्ति सुरक्षित करने पर जुटे हैं। अमेरिका में उत्पादित टाइप-ए जेट ईंधन पर विचार चल रहा है। हालांकि टाइप-ए ईंधन का मुख्य तौर पर अमेरिका में ही इस्तेमाल होता है। अब यूरोप में इस बात पर मंथन जारी है कि अमेरिका के टाइप-ए फ्यूल का उपयोग कैसे किया जाए?

एशिया को झेलनी पड़ रही भारी मार

ईरान युद्ध का सबसे अधिक खामियाजा एशिया को उठाना पड़ रहा है। युद्ध के बाद से एशिया में जेट ईंधन की कीमतों में 139 फीसद की बढ़ोतरी हो चुकी है। यूरोप दूसरे स्थान पर है। यहां 107 प्रतिशत का इजाफा देखने को मिला है। सबसे कम उत्तरी अमेरिका प्रभावित हुआ है। करीब 83 फीसद कीमतें बढ़ी हैं। युद्ध के बाद से अमेरिका की बल्ले-बल्ले हो गई है। अप्रैल महीने में उसने रिकॉर्ड स्तर पर जेट ईंधन का निर्यात किया।

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