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बस्ती जिले की जीवनरेखा मानी जाने वाली मनोरमा नदी अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है। कभी हजारों लोगों की आस्था, आजीविका और जीवन का आधार रही यह नदी आज बेबसी की तस्वीर बन गई है। समय-समय पर प्रशासन ने नदी की सफाई के लिए अभियान शुरू किए, लेकिन ये वादे केवल कागजों तक ही सीमित रहे। नदी की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ और उसकी पीड़ा जस की तस बनी रही। वर्ष 2019 में स्थानीय जनप्रतिनिधियों और प्रशासन ने श्रमदान किया था। इसके बाद 2026 में स्थानीय युवा आकाश गुप्ता और अन्य समाजसेवियों ने बिना किसी सरकारी सहायता के मनोरमा को बचाने की मुहिम छेड़ी, जिसकी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘मन की बात’ में सराहना की थी। हरैया विधायक अजय सिंह भी खुद नदी में उतरकर सफाई अभियान में शामिल हुए थे, जिससे लोगों में उम्मीद जगी थी। समाजसेवी चंद्रमणि पांडे (सुदामा) ने भी जन-सहयोग से कई बार सफाई के प्रयास किए। विधायक अजय सिंह ने विधानसभा में भी मनोरमा को सरयू नदी से जोड़ने की मांग उठाई, लेकिन नदी की तकदीर नहीं बदल सकी। जिस पानी में कभी आस्था की डुबकी लगाई जाती थी, वह अब कोयले जैसा काला पड़ चुका है। कप्तानगंज के ग्राम पंचायत नायकार निवासी पालटू भगत, जो बचपन से इसी नदी में स्नान कर शिव मंदिर में जल चढ़ाते थे, अब नल का पानी इस्तेमाल करने को मजबूर हैं। पालटू भगत ने दर्द भरी आंखों से बताया कि नदी का पानी छूते ही शरीर में तेज खुजली होने लगती है। यह स्थिति नदी के गंभीर प्रदूषण को दर्शाती है। यह वही नदी तट है जहां मखौड़ा धाम में राजा दशरथ के यज्ञ से प्रभु श्रीराम सहित चारों भाइयों का जन्म हुआ था। यहां भोलेनाथ का प्राचीन झुनियानाथ मंदिर भी आज भी आस्था का केंद्र है। नदी किनारे बसी निषाद बिरादरी, जिनकी रोजी-रोटी मछली पालन से चलती है, आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। मनोरमा नदी की सिसकियां अनसुनी न रहें, यही अब हर संवेदनशील मन की पुकार है।
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बस्ती की लाइफलाइन मनोरमा नदी का पानी काला:अस्तित्व बचाने को संघर्ष, सफाई अभियान रहे विफल
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