Homeदेश (National)बैसाखी मनाते तो हैं लेकिन क्यों यह पता है? असली कहानी चाहिए

बैसाखी मनाते तो हैं लेकिन क्यों यह पता है? असली कहानी चाहिए

बैसाखी भारत के प्रमुख त्योहारों में से एक है, जिसे हर साल बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। यह पर्व सिख धर्म के लोगों के लिए बेहद अहम माना जाता है, जिसे हरियाणा और पंजाब में फसल कटाई के उत्सव के रूप में भी मनाया जाता है। इस दिन जहां एक तरफ किसान अपनी मेहनत की फसल के तैयार होने की खुशी मनाते हैं, वहीं दूसरी तरफ सिख धर्म में इसका गहरा महत्व है क्योंकि इसी दिन गुरु गोविंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना की थी, जिससे सिख धर्म को एक नई पहचान मिली। इस तरह बैसाखी पर्व न केवल अच्छी फसल की कटाई का प्रतीक है बल्कि सिख पंथ के उत्थान का भी संदेश देता है।

बैसाखी पर्व हर साल की तरह इस साल भी लोग बड़े धूमधाम के साथ मना रहे हैं। इस साल 14 अप्रैल, मंगलवार के दिन बैसाखी पर्व मनाया जा रहा है। अब सवाल उठता है कि सिख धर्म के लोग बैसाखी त्योहार किस प्रकार मनाते हैं और इसका ऐतिहासिक महत्व क्या है?

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कैसे मनाई जाती है बैसाखी त्योहार?

बैसाखी के दिन सभी लोग स्नान करने के बाद गुरुद्वारा जाते हैं, जहां वे पूर्ण श्रद्धा भाव से गुरुवाणी का पाठ सुनते हैं। इस दिन गुरुद्वारों में लंगर की खास व्यवस्था की जाती है, जिसमें कई भक्त भोजन बनाने और परोसने में मदद करते हैं। कई लोग इस दिन अपनी श्रद्धा के अनुसार गरीबों को दान भी देते हैं। शाम होते ही सिख धर्म के लोग ढोल-नगाड़ों पर भांगड़ा और गिद्धा (डांस) करते हैं।

क्यों मनाते हैं किसान बैसाखी त्योहार?

भारत एक कृषि प्रधान देश है, जहां आज भी बड़ी संख्या में लोग खेती पर निर्भर हैं। पंजाब और हरियाणा में वैशाख महीने के दौरान रबी फसल, विशेष रूप से गेहूं की कटाई होती है। इसी समय किसानों को अपनी पूरे साल की मेहनत का फल मिलता है, जिससे उनके बीच खुशी की लहर दौड़ जाती है। किसान इस दिन भगवान का धन्यवाद करते हैं इसलिए वे बैसाखी पर्व मनाते हैं। सिख धर्म में बैसाखी को नए साल के रूप में भी देखा जाता है।

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बैसाखी के दिन खालसा पंथ को मिला अस्तित्व

सिख धर्म की मान्यता के अनुसार, बैसाखी के दिन ही खालसा पंथ की स्थापना हुई थी। 13 अप्रैल 1699 को सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोविंद सिंह ने अपने अनुयायियों की एक सभा बुलाई थी। इस सभा में उन्होंने लोगों से पूछा कि कौन धर्म के लिए अपना सिर कुर्बान कर सकता है। तब पांच युवाओं ने आगे बढ़कर अपनी आस्था दिखाई। इन पांचों को ‘पांच प्यारे’ कहा गया और उन्हें अमृत देकर दीक्षा दी गई। इसी के साथ खालसा पंथ की स्थापना हुई, जिसने सिख धर्म को एक नई दिशा और पहचान दी।

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