असम में 14 अप्रैल से रोंगाली बिहू त्योहार की शुरुआत हो गई है। यह पर्व कुल 7 दिनों तक मनाया जाता है। रोंगाली बिहू को असम में नए साल की शुरुआत के तौर पर मनाया जाता है। असम में कई लोग रोंगाली बिहू को बोहाग बिहू भी कहते हैं। इसी त्योहार को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने असम के लोगों को शुभकामनाएं दी हैं।
रोंगाली बिहू सात दिनों का त्योहार है, जो इस साल 14 अप्रैल से शुरू होकर 20 अप्रैल तक मनाया जाएगा। इस पर्व के सातों दिनों को अलग-अलग तरीके से मनाया जाता है। खास बात यह है कि हर दिन का अलग नाम और परंपरा होती है। अब सवाल उठता है कि रोंगाली बिहू त्योहार को सात दिनों तक किस प्रकार मनाया जाता है।
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सात दिनों तक क्यों मनाया जाता है रोंगाली त्योहार?
असम के लोगों के लिए रोंगाली बिहू बेहद अहम है। इस त्योहार में किसान अपनी फसल उगने की खुशी मनाते हैं। कई लोग अपने पालतू जानवरों की पूजा करते हैं साथ ही स्थानीय देवताओं की भी आराधना की जाती है। इस त्योहार के सातों दिन अलग-अलग परंपराओं के साथ मनाए जाते हैं और हर दिन का अपना एक नाम होता है।
सात दिन कैसे मनाया जाता है त्योहार?
रोंगाली बिहू के दौरान असम में खुशियों की लहर दौड़ जाती है, जहां सभी लोग मिलकर हर दिन अलग-अलग परंपराओं के साथ इस त्योहार को मनाते हैं।
गोरू बिहू – रोंगाली बिहू के पहले दिन को गोरू बिहू कहा जाता है, जो 14 अप्रैल को मनाया गया। इस दिन किसान खेतों में काम करने वाले जानवरों जैसे गाय और बैलों की पूजा करते हैं। इसके अलावा लोग अपने पालतू जानवरों को लौकी और बैंगन मिलाकर खिलाते हैं।
मानुह बिहू – दूसरे दिन को मानुह बिहू कहा जाता है, जो 15 अप्रैल को मनाया जाता है। इस दिन लोग नए कपड़े पहनते हैं और घर के बड़ों का आशीर्वाद लेते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन सफेद रंग के हाथ से बुने कपड़े पहनना शुभ माना जाता है।
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गोसाई बिहू – तीसरे दिन को गोसाई बिहू कहा जाता है, जो 16 अप्रैल को मनाया जाएगा। इस दिन लोग मंदिरों में जाकर पूजा-अर्चना और भजन-कीर्तन करते हैं।
कुतुम बिहू – चौथे दिन को कुतुम बिहू कहा जाता है, जो 17 अप्रैल को मनाया जाएगा। इस दिन परिवार और रिश्तेदार एक साथ मिलते हैं और पारंपरिक व्यंजन का आनंद लेते हैं।
सेनेही बिहू – पांचवें दिन को सेनेही बिहू कहा जाता है, जो 18 अप्रैल को मनाया जाएगा। इस दिन लोग असम का पारंपरिक नृत्य और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेते हैं।
मेला बिहू – छठे दिन को मेला बिहू कहा जाता है। इस दिन लोग मेलों और सांस्कृतिक आयोजनों में शामिल होते हैं।
चेरा बिहू – आखिरी दिन को चेरा बिहू कहा जाता है, जो 20 अप्रैल को मनाया जाएगा। इस दिन लोग पिठागुरी जैसे पारंपरिक व्यंजन खाते हैं।












