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अमेरिका-सऊदी अरब परमाणु डील से क्यों टेंशन में इजरायल, क्या होगा ईरान वाला हाल?

अमेरिका और सऊदी अरब जल्द ही एक ऐतिहासिक समझौते का ऐलान करने वाले हैं। डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन सऊदी अरब को पहली बार नागरिक परमाणु कार्यक्रम विकसित करने की अनुमति देने वाला है। समझौते के तहत सऊदी अरब को नागरिक उद्देश्य के लिए यूरेनियम संवर्धन करने की अनुमित होगी। जल्द ही ट्रंप प्रशासन कांग्रेस से समझौते को मंजूरी देने का अनुरोध करेगा।

समझौता परवान चढ़ने के बाद अमेरिकी कंपनियां सऊदी अरब में परमाणु प्लांट के विकास में मदद करेंगी। हालांकि यह डील मध्य पूर्व को एक और संकट की तरफ धकेल सकती है। इससे जुड़ी इजरायल की क्या चिंताएं… यह भी देखना होगा, क्योंकि इससे पहले जब भी किसी मध्य-पूर्व के देश ने परमाणु कार्यक्रम विकसित करने की कोशिश की तो उसे इजरायल से प्रत्यक्ष हमलों का सामना करना पड़ा है। क्या ईरान भी इससे खफा होगा। आइये समझते हैं…

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सऊदी अरब लंबे समय से अपना परमाणु कार्यक्रम शुरू करने की मंशा पाले बैठे है। उसने कई बार कहा है कि अगर ईरान परमाणु बम बनाएगा तो सऊदी अरब भी किसी हाल में इसे हासिल करेगा। पिछले साल और इस वर्ष अमेरिका और इजरायल ने ईरान के परमाणु संयंत्रों पर हमला किया। नागरिक उद्देश्य के लिए विकसित प्लांट पर भी अटैक किया। इसी समय सऊदी अरब को संवर्धन की अनुमति देना… दुनिया के सामने अमेरिका के दोहरे चेहरे को उजागर करेगा।

परमाणु समझौते पर सबसे बड़ी टेंशन क्या?

समझौते के मुताबिक सऊदी अरब अपने यहां ही यूरेनियम का संवर्धन कर सकेगा। अमेरिकी परमाणु तकनीक तक उसकी पहुंच होगी। परमाण प्लांट स्थापित करने में अमेरिकी कंपनियां सहायता करेंगी। मगर इस समझौते में दो सुरक्षा उपायों को शामिल नहीं किया गया। यही न केवल इजरायल, बल्कि पूरी दुनिया की टेंशन बढ़ाने वाले हैं।

पहला- सऊदी अरब को घरेलू स्तर पर यूरेनियम संवर्धन की अनुमति होगी।
दूसरा- अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के अतिरिक्त प्रोटोकॉल की जरूरत नहीं होगी।

क्या है अतिरिक्त प्रोटोकॉल?

इस सुरक्षा प्रोटोकॉल के तहत अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी नागरिक उद्देश्यों के परमाणु कार्यक्रम का निरीक्षण करती है और यह सुनिश्चित करती है कि यूरेनियम का सैन्य उद्देश्य की खातिर दुरुपयोग तो नहीं हो रहा है। मगर सऊदी अरब को इसमें छूट दी गई। यही कारण है कि न केवल इजरायल बल्कि अमेरिका में भी कई विशेषज्ञ चिंतित है। उनका मानना है कि सऊदी अरब नागरिक परमाणु कार्यक्रम का दोहरा इस्तेमाल कर सकता है।

ईरान की प्रतिस्पर्धा में सऊदी अरब वर्षों से परमाणु हथियार विकसित करने की फिराक में है। हालांकि एक खतरा यह भी है कि अगर ईरान का परमाणु कार्यक्रम तबाह कर दिया गया और बाद में सऊदी अरब ने अपना परमाणु कार्यक्रम शुरू किया तो ईरान उसे निशाना बना सकता है। इसकी एक वजह यह है कि पूरा सऊदी अरब ईरानी मिसाइल की जद में है।

इसके अलावा यमन के हूती विद्रोही भी हमला करने में सक्षम है। इस लिहाज से सऊदी अरब का परमाणु प्लांट तक पहुंचने का सफर इतना आसान नहीं है। इजरायल के सांसद अविगोर लिबरमैन ने भी यही खतरा जताया है। उन्होंने कहा कि सऊदी अरब की कोई परमाणु सुविधा ईरानी हमलों का निशाना बन सकती है।

सऊदी अरब कोई परमाणु बम हासिल नहीं करना चाहता, अगर ईरान ने परमाणु बम विकसित किया तो हम भी जल्द से जल्द ऐसा ही करेंगे। – क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान का 2018 में दिया गया बयान

क्या इजरायल कर सकता है हमला, तीन वाकये से समझिए

ईरान के अलावा इजरायल भी सऊदी अरब के सामने बड़ी चुनौती बन सकता है। अमेरिका ने पहले रियाद के सामने परमाणु समझौते के बदले इजरायल को मान्यता देने की शर्त रखी थी। हालांकि यह परवान नहीं चढ़ी। अबकी बार ट्रंप प्रशासन ने ऐसी कोई शर्त नहीं रखी। मगर खतरा यह है कि अगर सऊदी अरब ने तय सीमा से अधिक यूरेनियम संवर्धित करने की कोशिश की तो इजरायल उस पर हमला कर सकता है, क्योंकि जो इजरायल सऊदी अरब को एफ-35 फाइटर जेट देने का खुलकर विरोध कर सकता है, वह उसे परमाणु कार्यक्रम की अनुमति कैसे दे देगा। इसके तीन उदाहरण हैं-

पहला: इराक ने अपना नागरिक परमाणु कार्यक्रम शुरू करने की कोशिश की। मगर इजरायल के सामने यह सफल नहीं हो सका। 7 जून 1981 को इजरायल की वायुसेना ने ‘ऑपरेशन ओपेरा’ शुरू किया और इराक की राजधानी बगदाद में स्थित ओसिराक परमाणु रिएक्टर को भीषण बमबारी से तबाह कर दिया।

दूसरा: सीरिया ने भी अपना परमाणु कार्यक्रम शुरू किया था। पूर्वी सीरिया के अल-किबार में एक गुप्त परमाणु रिएक्टर बनाया गया था। 2007 में इजरायल की सेना ने ‘ऑपरेशन आउटसाइड द बॉक्स’ के तहत इसे भी तबाह कर दिया।

तीसरा: ईरान पिछले कई दशक से परमाणु बम हासिल करने की फिराक में है। उसने इस्फहान, नतांज और फोर्डो में परमाणु संयंत्रों की स्थापना की। 2025 में अमेरिका और इजरायल ने एक साथ मिलकर इन ठिकानों पर हमला किया। कई अन्य खुफिया अभियानों में भी इजरायल ईरान के परमाणु वैज्ञानिकों को मार चुका है।

इजरायल के निशाने पर क्यों आया सऊदी अरब?

अन्य देशों की तरह सऊदी अरब को बाहर से यूरेनियम खरीदने की जरूरत नहीं है। उसके पास अपने यूरेनियम भंडार है। इससे एक चिंता यह भी है कि बिना सुरक्षा उपाय के सऊदी अरब गुपचुप तरीके से यूरेनियम को तय सीमा से अधिक संवर्धित कर सकता है। यही कारण है कि इजरायल अब खुलकर समझौते के खिलाफ आ गया है।

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इजरायल के विरासत मंत्री अमिचाई एलियाहू ने कहा, ‘हम अंतरराष्ट्रीय मंच पर और अपनी विदेश नीति में यथासंभव प्रयास करेंगे ताकि मध्य पूर्व में किसी देश के पास परमाणु हथियार होने की संभावना को रोका जा सके। सऊदी अरब आज सही दिशा में आगे बढ़ रहा है, लेकिन कल स्थिति हमारे उलट भी हो सकती है।’

विपक्षी सांसद अविगोर लिबरमैन ने कहा, ‘सभी को यह समझने की आवश्यकता है कि सऊदी अरब का नागरिक परमाणु कार्यक्रम अंततः परमाणु हथियारों के निर्माण में परिणत होगा और पूरे मध्य पूर्व में एक पागलपन भरी हथियारों की होड़ को जन्म देगा।’

अमेरिका क्यों कर रहा यह समझौता?

अब सवाल यह उठा रहा है कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर हमलों के बीच अमेरिका ऐसा समझौता क्यों कर रहा है? दरअसल, अमेरिका के रणनीतिकारों का मानना है कि मौजूदा जंग की वजह से मध्य पूर्व में अमेरिका की रणनीतिक पकड़ ढीली हुई है। सऊदी अरब के साथ यह समझौता खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका के प्रभाव को मजबूत करेगा।

आसानी से क्यों नहीं मिलती यूरेनियम संवर्धन की अनुमति?

बिजली बनाने वाले परमाणु रिएक्टरों को महज 3.5 फीसद संवर्धित यूरेनियम की जरूरत होती है। इतनी सीमा तक यूरेनियम को संवर्धित करना अवैध नहीं है। अगर इससे अधिक सीमा तक संवर्धित किया गया तो परमाणु कार्यक्रम पर सवाल उठाना लाजिमी है। परमाणु बम बनाने के लिए 90 फीसद संवर्धित यूरेनियम की जरूरत होती है। ईरान के पास 400 किलो 60 फीसद तक संवर्धित यूरेनियम होने का शक है।

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