कानपुर। प्रदेश सरकार का लक्ष्य गांवों को आत्मनिर्भर बनाना है। कचरा प्रबंधन को आय से जोड़ने का यह मॉडल न केवल स्वच्छता सुनिश्चित कर रहा है, बल्कि पंचायतों की वित्तीय स्थिति भी मजबूत कर रहा है। यह पहल उत्तर प्रदेश की अन्य पंचायतों के लिए एक प्रेरणास्रोत है।
यह बातें रविवार को कानपुर के जिलाधिकारी जितेंद्र प्रताप सिंह ने कही। उत्तर प्रदेश सरकार ग्रामीण इलाकों की सूरत बदलने के लिए तकनीक और प्रबंधन पर विशेष जोर दे रही है। इसी क्रम में स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) फेज-2 के तहत कानपुर नगर के बिधनू विकास खंड की ग्राम पंचायत रमईपुर और बिल्हौर विकास खंड (तहसील परिसर के पास स्थित ग्रामीण क्लस्टर) में स्थापित प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट यूनिट ने कचरा प्रबंधन की नई राह दिखाई है। यहाँ स्थापित प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट यूनिट न केवल गांवों को गंदगी से मुक्त कर रही हैं, बल्कि पंचायतों के लिए आय का एक मजबूत जरिया भी बन गई हैं।
योगी सरकार ने करीब 16-16 लाख रुपये की लागत से इन आधुनिक केंद्रों को स्थापित किया है। पहले जिन गांवों की नालियां प्लास्टिक के कारण जाम रहती थीं और सड़कों के किनारे कूड़े के ढेर लगे रहते थे, वहां अब वैज्ञानिक तरीके से कचरे का निस्तारण हो रहा है। इन यूनिट्स में फटका, बेलिंग और श्रेडिंग जैसी आधुनिक मशीनें लगाई गई हैं, जो कचरे को उपयोगी कच्चे माल में बदल देती हैं।
इस व्यवस्था की सबसे बड़ी खूबी इसका विशाल नेटवर्क है। रमईपुर यूनिट को सरसौल, घाटमपुर, भीतरगांव, पतारा और बिधनू विकासखंडों से जोड़ा गया है। वहीं, बिल्हौर देहात यूनिट कल्याणपुर, चौबेपुर, शिवराजपुर, बिल्हौर और ककवन की ग्राम पंचायतों का प्लास्टिक प्रबंधन संभाल रही है। आरआरसी सेंटर और प्लास्टिक मुक्त अभियानों के माध्यम से गली-गली से अपशिष्ट एकत्र कर इन यूनिटों तक पहुंचाया जाता है।
प्रशासनिक सक्रियता का नतीजा है कि मार्च 2026 तक रमईपुर में 12 टन और बिल्हौर देहात में 11.50 टन प्लास्टिक अपशिष्ट का निस्तारण किया जा चुका है। प्रोसेस किए गए इस प्लास्टिक को रीसाइक्लिंग और को-प्रोसेसिंग के लिए भेजा जा रहा है। स्थानीय कबाड़ी नेटवर्क के साथ भी बेहतर तालमेल बिठाया गया है ताकि कचरे का अधिकतम मूल्य मिल सके। यह मॉडल केवल सफाई तक सीमित नहीं है, बल्कि पंचायतों को आर्थिक रूप से सशक्त बना रहा है। अब तक बिल्हौर क्षेत्र की यूनिट ने 48,000 रुपए और रमईपुर ने 30,000 रुपए की धनराशि सीधे अपने ओएसआर खाते में जमा की है। यह वह शुद्ध लाभ है जो प्रोसेस किए हुए कचरे को बेचने से प्राप्त हुआ है।
डोर-टू-डोर कलेक्शन और जैविक खाद से बढ़ी आय
पंचायतों की आत्मनिर्भरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि घरों और दुकानों से वसूले जाने वाले स्वच्छता शुल्क के माध्यम से अब तक करीब 2,50,000 रुपए की आय अर्जित की जा चुकी है। इससे सफाई व्यवस्था का दैनिक खर्च अब पंचायतें खुद वहन कर रही हैं। इसके साथ ही गीले कचरे के निस्तारण के लिए वर्मी कम्पोस्ट और नाडेप पद्धति अपनाई गई है। तैयार खाद 15 से 20 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से बेची जा रही है। अकेले रमईपुर में अब तक 2000 किलोग्राम से अधिक वर्मी कम्पोस्ट तैयार कर 25,000 रुपए की अतिरिक्त आय प्राप्त की गई है।
जिला पंचायत राज अधिकारी मनोज कुमार ने कहा कि हमने विभिन्न विकासखंडों को इस एकीकृत प्रणाली से जोड़ा है, जिससे कचरा प्रबंधन बेहद प्रभावी हो गया है। स्थानीय नेटवर्क और बेहतर समन्वय की वजह से हम कचरे का सही मूल्य प्राप्त कर रहे हैं, जिसका सीधा लाभ पंचायतों के विकास कोष में जा रहा है।












