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थानों में सीसीटीवी व्यवस्था ध्वस्त, सुप्रीम कोर्ट ने लिया संज्ञान,गृह सचिव से मांगा जवाब


  • कई राज्यों में 20-30% तक सीसीटीवी कैमरे नॉन-फंक्शनल
  • हिरासत में मौतों के मामलों ने बढ़ाई चिंता

नई दिल्ली। देशभर के पुलिस थानों में सीसीटीवी निगरानी व्यवस्था की खराब हालत पर सर्वोच्च न्यायालय ने कड़ा रुख अपनाया है। बीती 7 अप्रैल 2026 को हुई सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि बड़ी संख्या में सीसीटीवी कैमरे या तो काम नहीं कर रहे या निगरानी व्यवस्था अधूरी है। इस पर नाराजगी जताते हुए अदालत ने केंद्रीय गृह सचिव को तलब किया और अगली सुनवाई में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का निर्देश दिया। यह सुनवाई जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ के सामने हुई। 

कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि केवल कैमरे लगाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनका फंक्शनल  होना अनिवार्य है। अदालत ने केंद्र सरकार से पूछा कि आखिर क्यों कई राज्यों में सीसीटीवी व्यवस्था सही तरीके से लागू नहीं हो पाई, जबकि यह सीधे नागरिकों के मौलिक अधिकारों से जुड़ा मामला है। सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि कुछ तकनीकी और प्रशासनिक कारणों से दिक्कतें हैं और इस दिशा में काम किया जा रहा है। हालांकि, कोर्ट इस जवाब से संतुष्ट नहीं दिखा और गृह सचिव की मौजूदगी जरूरी बताते हुए मामले को अगले दिन के लिए सूचीबद्ध कर दिया।

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट पहले ही 2020 में स्पष्ट निर्देश दे चुका है कि सभी पुलिस थानों और जांच एजेंसियों जैसे सीबीआई, ईडी और एनआईए में सीसीटीवी कैमरे और रिकॉर्डिंग सिस्टम अनिवार्य रूप से लगाए जाएं। इसके बावजूद, ताजा स्थिति यह दशार्ती है कि कई जगह यह व्यवस्था कागजों तक सीमित है। कोर्ट के समक्ष रखी गई जानकारी के अनुसार, कई राज्यों में 20-30 प्रतिशत तक सीसीटीवी कैमरे नॉन-फंक्शनल हैं। कहीं कैमरे खराब पड़े हैं, तो कहीं रिकॉर्डिंग स्टोरेज और बैकअप सिस्टम नहीं है। कई थानों में लाइव मॉनिटरिंग के लिए केंद्रीकृत डैशबोर्ड भी अभी तक पूरी तरह तैयार नहीं हो पाया है।

यह मामला तब और गंभीर हो गया जब हाल के महीनों में हिरासत में मौतों के मामलों ने चिंता बढ़ा दी। रिपोर्ट्स में सामने आया कि कई घटनाओं में सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध नहीं था, जिससे जांच प्रभावित हुई। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेते हुए इस मुद्दे पर सुनवाई शुरू की। सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि यदि कुछ राज्य बेहतर व्यवस्था लागू कर सकते हैं, तो अन्य राज्य ऐसा क्यों नहीं कर पा रहे हैं। कोर्ट ने संकेत दिया कि एक समान और प्रभावी मॉडल पूरे देश में लागू करने की जरूरत है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह समस्या केवल तकनीकी नहीं, बल्कि जवाबदेही की कमी का परिणाम है। कैमरे लगाने के बाद उनकी नियमित निगरानी और रखरखाव पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया, जिससे पूरी व्यवस्था प्रभावित हुई है। फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद केंद्र सरकार पर दबाव बढ़ गया है। अब सबकी नजर अगली सुनवाई पर है, जहां गृह सचिव को अदालत के सामने स्थिति स्पष्ट करनी होगी और यह बताना होगा कि सीसीटीवी व्यवस्था को पूरी तरह कार्यशील बनाने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जाएंगे।

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