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सिद्धार्थनगर में गेहूं कटाई के बाद खेतों में लगी आग:कई गांव प्रभावित, आसमान हुआ लाल; नियम बेअसर, पर्यावरण और सुरक्षा पर बढ़ा खतरा


सिद्धार्थनगर जिले के शोहरतगढ़ तहसील क्षेत्र में गेहूं की कटाई के बाद पराली जलाने का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। 16 अप्रैल की रात सनई मार्च क्षेत्र के धेन्सा नानकार, कपिया चौराहा, बसठा और बरगदवा सहित कई गांवों में किसानों द्वारा खुलेआम पराली जलाई गई। रात के अंधेरे में खेतों से उठती आग की ऊंची लपटें और घना धुआं दूर-दूर तक दिखाई दिया। तेज हवाओं के कारण आग तेजी से फैलती चली गई और कई खेत इसकी चपेट में आ गए। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, कई जगह एक साथ पराली जलने से पूरा इलाका धुएं की चादर में ढक गया और आसमान लाल नजर आने लगा। धुआं नेशनल हाईवे तक पहुंचा, यातायात प्रभावित हालात इतने गंभीर हो गए कि खेतों से उठता धुआं पास के नेशनल हाईवे तक पहुंच गया। इससे वाहनों की रफ्तार धीमी करनी पड़ी और कई जगह दृश्यता कम होने से दुर्घटना का खतरा बढ़ गया। राहगीरों को सांस लेने में भी परेशानी का सामना करना पड़ा। नियमों के बावजूद जारी पराली जलाना, NGT के निर्देश बेअसर पराली जलाने पर राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) और शासन द्वारा सख्त प्रतिबंध लगाए गए हैं। नियमों के अनुसार यह दंडनीय अपराध है और किसानों पर जुर्माने का प्रावधान भी है। इसके बावजूद क्षेत्र में लगातार पराली जलाने की घटनाएं सामने आ रही हैं, जिससे प्रशासनिक निगरानी पर सवाल उठ रहे हैं। जुर्माने का प्रावधान, फिर भी नहीं थम रहा सिलसिला 2 एकड़ तक भूमि वाले किसानों पर 2500 रुपये, 2 से 5 एकड़ तक 5000 रुपये और 5 एकड़ से अधिक भूमि पर 15000 रुपये तक जुर्माने का प्रावधान है। इसके अलावा सरकारी योजनाओं से वंचित किए जाने और राजस्व रिकॉर्ड में प्रविष्टि तक की कार्रवाई हो सकती है। मिट्टी की सेहत और उपज पर गंभीर असर विशेषज्ञों के अनुसार पराली जलाने से मिट्टी का तापमान बढ़ जाता है, जिससे लाभकारी जीवाणु नष्ट हो जाते हैं। नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश और सल्फर जैसे आवश्यक पोषक तत्व खत्म होने से खेत की उर्वरता घटती है और उत्पादन पर असर पड़ता है। स्वास्थ्य के लिए भी खतरा, बढ़ रहे सांस के मरीज पराली से निकलने वाला धुआं वायु प्रदूषण को खतरनाक स्तर तक पहुंचा देता है। इससे सांस की बीमारियां, एलर्जी, आंखों में जलन और अस्थमा जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं। बच्चे और बुजुर्ग सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं। प्रशासनिक सक्रियता पर उठे सवाल लगातार घटनाओं से प्रशासनिक दावों और जमीनी हकीकत के बीच अंतर स्पष्ट दिखाई दे रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो यह समस्या पर्यावरण और जनजीवन दोनों के लिए गंभीर संकट बन सकती है।

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