- लागत बढ़ने से ठेकेदारों ने राहत की मांग तेज की
- सरकार कर रही समीक्षा, जल्द राहत पैकेज की उम्मीद
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में सड़क निर्माण कार्य इन दिनों बढ़ती डामर कीमतों के कारण गंभीर दबाव में हैं। बीते कुछ महीनों में डामर (बिटुमेन) के दामों में 30 से 40 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की गई है, जिससे पहले से स्वीकृत टेंडर दरों पर काम करना ठेकेदारों के लिए मुश्किल होता जा रहा है। जहां पहले डामर की कीमत लगभग 40 से 45 हजार रुपये प्रति मीट्रिक टन थी, वहीं अब यह बढ़कर 60 से 70 हजार रुपये तक पहुंच गई है। इस अचानक बढ़ोतरी ने परियोजनाओं की लागत संरचना को पूरी तरह प्रभावित कर दिया है।
ठेकेदारों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में उछाल का सीधा असर डामर पर पड़ा है। चूंकि डामर कच्चे तेल से बनने वाला उत्पाद है, इसलिए इसके दाम वैश्विक बाजार से प्रभावित होते हैं। वर्तमान परिस्थितियों में पुराने रेट पर काम जारी रखना आर्थिक रूप से घाटे का सौदा साबित हो रहा है। कई ठेकेदारों ने चेतावनी दी है कि यदि शीघ्र राहत नहीं मिली तो वे काम धीमा करने या रोकने को मजबूर हो सकते हैं।
प्रदेश के कई जिलों-लखनऊ, कानपुर, प्रयागराज, गोरखपुर सहित आसपास के क्षेत्रों में सड़क निर्माण और मरम्मत कार्यों की रफ्तार पर इसका असर साफ दिखाई दे रहा है। कुछ परियोजनाओं में काम की गति कम कर दी गई है, जबकि कुछ जगहों पर सामग्री की कमी और बढ़ती लागत के कारण कार्य आंशिक रूप से रोक दिए गए हैं। खासकर ग्रामीण और संपर्क मार्गों के निर्माण कार्य सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं। सप्लाई की समस्या ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। पर्याप्त मात्रा में समय पर डामर उपलब्ध न होने के कारण निर्माण एजेंसियों को अपने कार्यों की गति कम करनी पड़ रही है। इसके चलते न केवल नई परियोजनाएं प्रभावित हो रही हैं, बल्कि गड्ढामुक्त सड़क अभियान और नियमित मरम्मत कार्यों पर भी असर पड़ रहा है। इससे आम जनता को भी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।
उत्तर प्रदेश ठेकेदार कल्याण समिति ने मुख्यमंत्री से हस्तक्षेप की मांग करते हुए टेंडर दरों में संशोधन और लागत अंतर की भरपाई के लिए विशेष पैकेज की मांग की है। समिति का कहना है कि भुगतान प्रक्रिया को सरल और तेज किया जाए, ताकि ठेकेदारों पर वित्तीय दबाव कम हो सके। उनका तर्क है कि वर्तमान हालात में बिना दर संशोधन के काम करना व्यवहारिक नहीं है। सरकारी स्तर पर अधिकारियों का कहना है कि स्थिति की लगातार समीक्षा की जा रही है। केंद्र सरकार द्वारा जारी मूल्य समायोजन संबंधी दिशा-निदेर्शों का अध्ययन किया जा रहा है और राज्य स्तर पर भी राहत के विकल्पों पर विचार चल रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कीमतों में जल्द स्थिरता नहीं आई, तो आने वाले महीनों में सड़क निर्माण की रफ्तार और धीमी हो सकती है। फिलहाल, सरकार और ठेकेदारों के बीच संवाद जारी है। सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि राज्य सरकार कब और किस रूप में राहत प्रदान करती है, ताकि विकास कार्यों की गति बनी रहे और जनता को बेहतर सड़क सुविधाएं समय पर मिल सकें।












