कानपुर। कानपुर में साइबर अपराध के खिलाफ चलाए जा रहे सबसे बड़े अभियानों में पुलिस ने एक ऐसे संगठित अंतरराज्यीय साइबर फ्रॉड नेटवर्क का भंडाफोड़ किया है, जो डिजिटल अरेस्ट, फर्जी जीएसटी फर्म और बैंकिंग सिस्टम में सेंध लगाकर करोड़ों की ठगी को अंजाम दे रहा था।
पुलिस ने इस पूरे नेटवर्क से जुड़े आठ आरोपितों को गिरफ्तार किया है और 125 करोड़ रुपये से अधिक के संदिग्ध लेन-देन का खुलासा किया है।
पुलिस आयुक्त रघुबीर लाल ने गुरुवार को बताया कि थाना बर्रा पुलिस ने मुखबिर की सूचना पर एच ब्लॉक पेट्रोल लाइन के पास स्थित प्राइमरी स्कूल के पास छापेमारी कर इस गैंग के तीन सदस्यों को मौके से पकड़ा, जिसके बाद पूछताछ और नेटवर्क की कड़ियों के आधार पर पांच अन्य आरोपितों को भी गिरफ्तार किया गया।
पूरी कार्रवाई पुलिस आयुक्त के निर्देशन में और वरिष्ठ अधिकारियों के पर्यवेक्षण में की गई। गिरफ्तार आरोपितों में सोनू शर्मा, सतीश पांडेय, साहिल विश्वकर्मा, धर्मेंद्र सिंह, तनिष गुप्ता, अमित सिंह, अमित कुमार और आशीष कुमार शामिल हैं।
बैंकिंग सिस्टम के भीतर से चलता था साइबर फ्रॉड
जांच में सामने आया है कि यह गिरोह केवल साइबर ठगी तक सीमित नहीं था, बल्कि बैंकिंग सिस्टम के भीतर मौजूद कुछ कर्मियों की मिलीभगत से एक पूरा अवैध वित्तीय नेटवर्क चला रहा था।
फर्जी जीएसटी फर्म और कूटरचित दस्तावेजों के आधार पर करंट और ट्रस्ट अकाउंट खोले जाते थे, जिनका इस्तेमाल डिजिटल अरेस्ट और इन्वेस्टमेंट फ्रॉड से आने वाली रकम को खपाने के लिए किया जाता था।
आरोप है कि कुछ बैंक कर्मचारी इन फर्जी खातों को खोलने में मदद करते थे और इसके बदले पांच से 10 प्रतिशत तक कमीशन प्राप्त करते थे। शिकायत आने पर तुरंत पैसा निकाल लिया जाता था ताकि किसी भी प्रकार की ट्रेसिंग न हो सके।
125 करोड़ से अधिक के ट्रांजेक्शन का खुलासा
पुलिस जांच में अब तक सामने आया है कि एक खाते से लगभग 53 करोड़ रुपये का लेन-देन, दूसरे खाते से लगभग 66 करोड़ रुपये, एक अन्य खाते से लगभग 05 करोड़ रुपये, नवी मुंबई साइबर मामले में 58 करोड़ रुपये का डिजिटल अरेस्ट फ्रॉड, इस तरह यह नेटवर्क 125 करोड़ रुपये से अधिक के साइबर फ्रॉड में सक्रिय पाया गया है।
गैंग का तरीका पूरी तरह संगठित और पेशेवर स्तर का था। फर्जी कंपनियों के नाम पर जीएसटी रजिस्ट्रेशन, बैंक कर्मियों की मिलीभगत से हाई लिमिट अकाउंट खोलना, डिजिटल अरेस्ट और इन्वेस्टमेंट, फ्रॉड की रकम सीधे इन खातों में मंगवाना।
फिर तुरंत रकम निकालकर सिस्टम से गायब कर देना। इसके अलावा बैंकिंग चैनल के भीतर से ही पूरे लेन-देन को कंट्रोल करना। साइबर फ्रॉड की दूसरी परत के रूप में नेटवर्क काम करता था।
यह गिरोह सीधे फ्रॉड नहीं करता था, बल्कि बड़े साइबर अपराधों से आई रकम को “व्हाइट मनी” में बदलने का काम करता था, जिससे यह साइबर क्राइम की सबसे खतरनाक लेयर बन गया था।
पुलिस आयुक्त ने सख्त चेतावनी और अपील करते हुए कहा कि डिजिटल अरेस्ट जैसी किसी भी कॉल पर भरोसा न करें। ओटीपी, बैंक डिटेल या निजी जानकारी किसी से साझा न करें। संदिग्ध कॉल या लेन-देन की तुरंत साइबर हेल्पलाइन 1930 पर शिकायत करें।












