सिद्धार्थनगर में एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन विषय पर आयोजित दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम 20 मई 2026 को संपन्न हुआ। इस कार्यक्रम में प्रसार कार्यकर्ताओं को रासायनिक उर्वरकों के संतुलित उपयोग और उनके दुष्परिणामों के बारे में जानकारी दी गई। केंद्र के वरिष्ठ कृषि प्रसार वैज्ञानिक डॉ. शेष नारायण सिंह ने बताया कि रासायनिक उर्वरकों के असंतुलित प्रयोग से खेती की लागत बढ़ रही है और मिट्टी, जल तथा वायु प्रदूषण की समस्या गंभीर हो रही है। उन्होंने किसानों को उर्वरकों का संतुलित मात्रा में प्रयोग करने की सलाह दी। केंद्र के बीज वैज्ञानिक डॉ. सर्वजीत ने जैव उर्वरकों के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि इनके प्रयोग से उपज में वृद्धि होती है, उत्पादन लागत कम आती है और मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार होता है। मृदा वैज्ञानिक डॉ. प्रवेश कुमार देहाती ने किसानों को रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने के लिए एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन तकनीक अपनाने का सुझाव दिया। इसमें फसल अवशेषों को मिट्टी में मिलाना, हरी खाद का प्रयोग, फसल चक्र में दलहनी फसलों को शामिल करना और जैविक खादों जैसे केंचुआ खाद, शहरी कंपोस्ट तथा तेल की खलियों का समन्वित प्रयोग शामिल है। उन्होंने मृदा परीक्षण के आधार पर ही उर्वरकों के संतुलित प्रयोग पर जोर दिया। उद्यान वैज्ञानिक डॉ. प्रवीण कुमार मिश्रा ने फल एवं सब्जियों की अधिक और गुणवत्तायुक्त पैदावार के लिए एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन तकनीक अपनाने की बात कही। उन्होंने बताया कि इससे उत्पादन लागत कम होगी और पैदावार बढ़ेगी। उन्होंने फसल अवशेषों का उपयोग फल एवं सब्जियों की खेती में आच्छादन (मल्चिंग) के रूप में करने की सलाह भी दी। केंद्र के पशु विज्ञान वैज्ञानिक डॉ. सुनील सिंह ने कृषि में पशुपालन के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि पशुपालन के बिना कृषि अधूरी है, क्योंकि ये दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में रवेंद्र, रमाशंकर पटेल, शुभम वर्मा, सुजीत कुमार मौर्य, संतोष कुमार, रमाकांत प्रसाद, राजकुमार और दिनेश सहित कई प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया।
इटवा में कृषि विज्ञान केंद्र में प्रशिक्षण संपन्न:रासायनिक उर्वरकों के दुष्परिणामों पर हुई चर्चा
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