नई दिल्ली। पूरे उत्तर भारत में इस समय भीषण गर्मी का प्रकोप है। दिल्ली और एनसीआर में तापमान 46 डिग्री सेल्सियस को पार कर चुका है, लेकिन इस जानलेवा गर्मी के बीच एक और हैरान करने वाली परेशानी सामने आई है।
आमतौर पर हम मानते हैं कि प्रदूषण सिर्फ सर्दियों की समस्या है, जब अक्टूबर-नवंबर में आसमान धुंधला हो जाता है और एक्यूआइ बढ़ते ही हड़कंप मच जाता है। गर्मियों के आते ही हमें लगता है कि ”अभी तो सब सेफ है”, लेकिन हकीकत यह है कि गर्मियों का प्रदूषण सर्दियों के स्माग की तरह आंखों से दिखाई नहीं देता।
हवा के इस बिगड़ते रुख को देखते हुए वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) ने इस भीषण गर्मी के बीच ही दो दिन पहले ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (ग्रेप) का पहला चरण लागू किया है।
गर्मियों के प्रदूषण का विज्ञान : आखिर क्यों बढ़ रहा?
सर्दियों और गर्मियों के प्रदूषण में बड़ा अंतर है। गर्मियों में प्रदूषण का सबसे बड़ा कारक पीएम 10 (पार्टिकुलेट मैटर 10) है और इसका मुख्य स्रोत धूल है। इसके पीछे दो मुख्य कारण हैं:-
1. थार मरुस्थल से उठने वाला बवंडर : उत्तर-पश्चिम भारत में थार का रेगिस्तान है। गर्मियों में जब यह इलाका बुरी तरह तपता है, तो वहां एक ”थर्मल लो प्रेशर सिस्टम” (कम दबाव का क्षेत्र) बनता है, जो ईरान तक फैला होता है। विज्ञान के नियम के मुताबिक, इस खाली जगह को भरने के लिए तेज पश्चिमी हवाएं चलती हैं, जिन्हें हम ”लू” कहते हैं। 40 से 60 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से चलने वाली ये हवाएं खाली नहीं आतीं, बल्कि अपने साथ मरुस्थल और पश्चिमी एशिया की भारी धूल उड़ाकर लाती हैं। उत्तर भारत के भूगोल की बनावट ऐसी है कि उत्तर में हिमालय और दक्षिण में प्रायद्वीपीय पठार के बीच यह धूल फंस जाती है। मानसून के आने तक यह धूल यहीं हवा में घूमती रहती है और पीएम 10 के स्तर को बढ़ाती है।
2. स्थानीय कारण और ग्राउंड-लेवल ओजोन का खतरा : स्थानीय स्तर पर टूटी सड़कें, खुले छोड़े गए निर्माण स्थल और बिना घास-फूस की सूखी जमीन इस समस्या को और बढ़ा देती हैं। तेज धूप मिट्टी को सुखाकर ढीला कर देती है, और लू के झोंके इसे हवा में उड़ा देते हैं।
इसके अलावा, गर्मियों में एक और खतरनाक प्रदूषक पैदा होता है, जिसके बारे में बात नहीं की जाती वह ”ग्राउंड लेवल ओजोन”। यह आसमान (स्ट्रैटोस्फीयर) वाली अच्छी ओजोन नहीं है जो हमें अल्ट्रावायलेट किरणों से बचाती है। बल्कि यह जमीन के पास नाइट्रोजन ऑक्साइड और वाष्पशील कार्बनिक यौगिकों के बीच तेज धूप और गर्मी के कारण होने वाले रासायनिक रिएक्शन से बनती है।
सेहत पर असर: घर-घर में खांसी और एलर्जी
यह खतरनाक ओजोन और हवा में तैरते धूल के कण फेफड़ों के टिश्यूज को भारी नुकसान पहुंचाते हैं। यही कारण है कि इस समय हमारे आसपास बहुत से लोग साइनस, एलर्जी, पेट की खराश, लगातार आने वाली खांसी और आंखों में जलन से पीड़ित हैं।












