- 980वीं श्रीराम कथा का भव्य समापन,
हरिद्वार। परम पवित्र सप्तपुरी देवभूमि हरिद्वार की पुण्यधरा रामनाम के दिव्य रस, संतों की वाणी और भक्ति की मधुर सरिता से अनुप्राणित हो उठी। प्रेम नगर आश्रम में पूज्य मोरारी बापू के 980वीं श्रीराम कथा का समापन अत्यन्त श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक गरिमा के साथ सम्पन्न हुआ। श्रीराम कथा के माध्यम से भगवान श्रीराम के दिव्य चरित्र का वर्णन तथा वर्तमान समय में मानवीय मूल्यों, करुणा, सत्य, मर्यादा, प्रेम और सेवा को जीवन में उतारने की प्रेरणा पूज्य बापू ने प्रदान की।
समापन अवसर पर उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कथा-स्थल पर पहुँचकर श्रद्धापूर्वक रामकथा का श्रवण किया तथा मोरारी बापू, स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी सहित संतों का आशीर्वाद प्राप्त किया। इस पावन अवसर पर महामण्डलेश्वर सतुआ बाबा जी एवं आचार्य लोकेश मुनि जी की गरिमामयी उपस्थिति ने कार्यक्रम की आध्यात्मिक गरिमा को और अधिक आलोकित किया।
मोरारी बापू के श्रीमुख से प्रवाहित रामकथा रूपी ज्ञानधारा आत्मा को स्पर्श करने वाला जीवन-दर्शन है। उनकी वाणी में प्रवाहित श्री राम कथा के माध्यम से उन्होंने प्रेरणा दी कि श्रीराम जी का जीवन हमें विभाजन नहीं, बल्कि समरसता; संघर्ष नहीं, बल्कि समाधान; और अधिकार नहीं, बल्कि कर्तव्य का मार्ग दिखाता है।
श्री रामकथा का वास्तविक उद्देश्य जीवन का परिवर्तन है। जब मन में राम बसते हैं तो व्यवहार में करुणा आती है, परिवार में प्रेम बढ़ता है, समाज में विश्वास जागता है और राष्ट्र में नैतिकता का प्रकाश फैलता है। यही श्रीराम कथा की सबसे बड़ी साधना और सबसे बड़ा संदेश है।
आज विश्व अनेक प्रकार की चुनौतियों से गुजर रहा है। ऐसे समय में श्रीरामजी के आदर्श सत्य, त्याग, सेवा, मर्यादा, सहिष्णुता और लोकमंगल, मानवता के लिए सबसे बड़ा पथप्रदर्शक बन सकते हैं। राष्ट्र की वास्तविक शक्ति केवल आर्थिक प्रगति में नहीं, बल्कि संस्कारित नागरिकों, संवेदनशील समाज और मूल्यनिष्ठ जीवन में निहित होती है।
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परमार्थ पीठाधीश्वर स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने संदेश दिया कि श्री राम केवल एक नाम नहीं, भारत की आत्मा हैं। राम केवल आराधना नहीं, बल्कि जीवन की मर्यादा, राष्ट्र की संस्कृति और मानवता की चेतना हैं। जिस राष्ट्र के हृदय में राम बसते हैं, वहाँ विभाजन नहीं, एकता जन्म लेती है; वहाँ वैमनस्य नहीं, सद्भाव पल्लवित होता है; वहाँ स्वार्थ नहीं, सेवा संस्कार बन जाती है।
आज भारत को केवल आर्थिक रूप से सशक्त बनने की नहीं, बल्कि आध्यात्मिक, नैतिक और सांस्कृतिक रूप से भी विश्व का पथप्रदर्शक बनने की आवश्यकता है। श्री राम जी की शक्ति का आधार शस्त्र नहीं, चरित्र है; नेतृत्व का आधार अधिकार नहीं, उत्तरदायित्व है; और राष्ट्र की वास्तविक पहचान उसकी सीमाओं से नहीं, बल्कि उसके संस्कारों से होती है।
आइए, हम श्रीराम जी को अपने विचारों में, व्यवहार में, परिवार में, शिक्षा में, शासन में और राष्ट्र-जीवन के प्रत्येक आयाम में उतारें। जब प्रत्येक भारतीय के हृदय में श्री राम के सत्य, करुणा, सेवा, समरसता और मर्यादा के मूल्य जागृत होंगे, तब भारत केवल एक शक्तिशाली राष्ट्र ही नहीं, बल्कि विश्व को शान्ति, सह-अस्तित्व और वसुधैव कुटुम्बकम् का मार्ग दिखाने वाला विश्वगुरु बनेगा। यही रामकथा का संदेश है, यही राष्ट्रधर्म है और यही मानवता का भविष्य है। उन्होंने बापू को 980 वीं श्रीराम कथा की अमृत धारा प्रवाहित करने हेतु अनेकानेक धन्यवाद देते हुये उनका अभिनन्दन किया।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी संतों का आशीर्वाद प्राप्त करते हुए भारतीय संस्कृति, सनातन परम्परा और संत समाज के राष्ट्र निर्माण में योगदान को नमन करते हुये उन्होंने कहा कि संतों की प्रेरणा समाज को दिशा देती है तथा रामकथा नई पीढ़ी को भारतीय संस्कृति और जीवन-मूल्यों से जोड़ने का कार्य करती हैं। उन्होंने कहा कि बापू का सान्निध्य उन्हें कई बार प्राप्त हुआ और हर बार उन्हें एक नूतन ऊर्जा प्राप्त होती है। स्वामी जी ने मोरारी बापू को रूद्राक्ष का दिव्य पौधा और भगवान शिव की प्रतिमा भेंट कर उत्तराखंड़ की दिव्य भूमि पर उनका अभिनन्दन किया।












