गोरखपुर : कुलपति प्रो पूनम टंडन ने दी हार्दिक शुभकामनाएं। दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय की आदरणीय कुलपति प्रो पूनम टंडन जी ने इस शोध पत्र के प्रकाशन पर अपनी हार्दिक प्रसन्नता व्यक्त की है और कहा कि *यह विश्विद्यालय के तेजी से बदलते अकादमिक संस्कृति का एक और परिचायक है। पहले कला संकाय के पारंपरिक विषयों यथा साहित्य और मानविकी में स्कॉपस प्रकाशन नहीं के बराबर होते थे। इधर दो वर्षों में इसकी शुरुआत हुई है। हम अन्य विभागों से भी यह आशा करते हैं कि वे भी अपने प्रकाशन ऐसे अंतरराष्ट्रीय मानक वाले शोध पत्रिकाओं में अपने शोध को प्रकाशित करें। इससे विश्वविद्यालय की रेटिंग में भी सुधार आता है। उन्होंने उम्मीद जताई कि आगे भी ऐसे प्रकाशन होते रहने चाहिए। उन्होंने शोधार्थियों को इसके लिए शाबाशी दी है।
अंग्रेजी विभाग, दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय में कार्यरत अंग्रेजी विभाग के प्रो आमोद कुमार राय एवं उनकी शोध छात्रा जेहरा शमशीर का शोध पत्र एनवायरनमेंटल डिस्कोर्स: इन सिलेक्टेड टेक्स्ट्स ऑफ साइंस, मीडिया एंड लिटरेचर देश विदेश में अत्यधिक गुणवत्तायुक्त शोध पत्रिका इकोलॉजी, एनवायरनमेंट और कंजरवेशन के अप्रैल अंक में प्रकाशित हुआ है। ज्ञात हो कि यह शोध पत्रिका देश विदेश में लगभग 12 लाख से अधिक सब्सक्राइबर्स रखती है और क्यू वन श्रेणीं में हाई इंडेक्स 21 के साथ साथ गूगल स्कॉलर हाई इंडेक्स 19 और नास रेटिंग 5.05 का अत्यधिक उच्च मानक प्राप्त है। विश्विद्यालय के कला संकाय के किसी भी प्राध्यापक के लिए यह पहला अवसर है जब उनका शोध पत्र इतने उच्चीकृत मानक युक्त शोध पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। इस पत्रिका का प्रकाशन EM इंटरनेशनल के द्वारा होता है।
इस शोध पत्र में लेखकों के द्वारा यह बताया गया है कि पर्यावरण संरक्षण के लिए साहित्य, विज्ञान और मीडिया जगत में जो अलग-अलग डिसकोर्सेज अर्थात वैचारिकी बनाई जाती है उनसे यदि हम अलग-अलग इनपुट प्राप्त करने की कोशिश करते हैं तो वह उतना फलदायी नहीं होगा। व्यवहारिक और कार्य योजना में अमल लाने योग्य रणनीति अथवा डिस्कोर्स तभी कारगर होगा जब हम इन तीनों विषयों में प्रतिपादित पर्यावरण संरक्षण के उपाय और रणनीतियों का एक तुलनात्मक विश्लेषणात्मक अध्ययन करेंगे। विज्ञान हमें यह बताता है कि हमें पर्यावरण संरक्षण के लिए केवल भावनात्मक रूप से बड़ी-बड़ी शास्त्र सम्मत बातें करके कोई लाभ प्राप्त नहीं होगा। हमे सूक्ष्म विश्लेषण करना होगा। साहित्य ने भी समय-समय पर विभिन्न सिद्धांतों के द्वारा यह बताने की कोशिश की है कि हमें पर्यावरण संरक्षण एवं संवर्धन के लिए कुछ ठोस उपाय करने होंगे। विज्ञान जगत के द्वारा बताए गए बिंदुओं के साथ संवेदनाओं को जोड़ते हुए एक कुशल रणनीति बनानी होगी। साहित्य एवं विज्ञान के अलावा मीडिया जगत में भी रह रहकर पर्यावरण संरक्षण के लिए अनेको कार्यक्रम और लेख श्रृंखलाएं चलाई जाती हैं। हमें उन पर भी बहुत पैनी नजर रखनी होगी। संपूर्ण वसुधा को एक इकाई मानकर अलग-अलग क्षेत्र में किस तरह के पर्यावरणीय चेतना को जागृत करने की आवश्यकता है इसका ज्ञान हमें तभी हो पाएगा जब हम इन तीनों विषयों में एक अंतरानुशासी अध्ययन को बढ़ावा देने की कोशिश करेंगे। फेयरक्लॉग के डिस्कोर्स एनालिसिस सिद्धांत के परिप्रेक्ष्य में इस शोध पत्र को पूर्ण किया गया है।
एडवर्ड विल्सन की कृति हॉफ अर्थ : आवर प्लैनेट्स फाइट फॉर लाइफ़
रामचंद्र गुहा की कृति स्पीकिंग विथ नेचर: द ओरिजिन ऑफ इंडियन एनवायरनमेंटलिजम और नाओमी क्लेन ऑन फायर: द बर्निंग केस फॉर ए ग्रीन न्यू डील के तुलनात्मक अध्ययन से शोधार्थियों ने यह बताने का प्रयास किया है कि मानव केंद्रित चिंतन को किनारे कर वसुधा केंद्रित नीतियां बनाने का यह सर्वश्रेष्ठ समय है। हम सभी को मिलकर वास्तविक पर्यावरण संरक्षण एवं संवर्धन की दिशा में आगे बढ़ना होगा। केवल पर्यावरण दिवस मना भर लेने से पर्यावरण के प्रति हमारी जिम्मेदारी पूरी नहीं हो जाती।
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इस अवसर पर विभागाध्यक्ष प्रो सुनीता मुर्मू, प्रो आलोक कुमार, प्रो अजय शुक्ला, प्रो गौरहरि बेहरा, प्रो अवनीश राय, प्रो शिखा सिंह आदि ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए दोनों शोधार्थियों को अनेक शुभकामनाएं दी हैं। यू जी सी केयर लिस्ट, वेब ऑफ साइंस, एब्सको – यू एस, इंडियन साइंस एब्स्ट्रेक्ट्स निसकेयर, रिसर्च बाइबल जापान और रिसर्च गेट में इंडेक्स्ड अर्थात सूचीबद्ध है यह शोध पत्रिका।
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