सिद्धार्थनगर का स्वास्थ्य विभाग इन दिनों सवालों के घेरे में है। वर्ष 2023 के एक चर्चित भ्रष्टाचार प्रकरण में अभियोजन स्वीकृति की प्रक्रिया अंतिम चरण में है, वहीं अवैध अस्पतालों पर कार्रवाई न होने से विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। इस पूरे घटनाक्रम ने स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली, पटल आवंटन और निजी अस्पतालों की निगरानी व्यवस्था को कठघरे में खड़ा कर दिया है। यह मामला केवल एक अधिकारी या मुकदमे तक सीमित नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगाता है। आरोप है कि भ्रष्टाचार के आरोपों और कानूनी कार्रवाई के बावजूद संवेदनशील जिम्मेदारियां उन्हीं लोगों को सौंपी जा रही हैं, जिनके खिलाफ जांच जारी है। सितंबर 2023 में निजी अस्पतालों के पंजीकरण और नवीनीकरण से जुड़े कथित लेन-देन का मामला सामने आया था। तत्कालीन मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. विनोद कुमार अग्रवाल ने तब नोडल अधिकारी डॉ. एम.एम. त्रिपाठी, फार्मासिस्ट रंजीत कुमार और डॉ. बी.एन. चतुर्वेदी के खिलाफ थाना सिद्धार्थनगर में मुकदमा दर्ज कराया था। इसके बाद डॉ. एम.एम. त्रिपाठी को नैदानिक स्थापना पटल से हटा दिया गया था। इस प्रकरण की प्रशासनिक जांच भी हुई और मामला शासन तक पहुंचा। लगभग ढाई वर्ष बाद यह मामला फिर से चर्चा में है। उत्तर प्रदेश शासन के चिकित्सा अनुभाग-3 से विशेष सचिव धीरेंद्र सिंह सचान ने एक पत्र जारी कर बताया है कि मुकदमा संख्या 267/2023 में अभियोजन स्वीकृति के संबंध में न्याय विभाग स्तर पर कार्रवाई जारी है। पुलिस अधीक्षक अपराध, उत्तर प्रदेश को निर्देश दिया गया है कि संबंधित विवेचक को मूल केस डायरी, आरोप पत्र और सभी अभिलेखों के साथ 3 जून 2026 को सचिव भवन, लखनऊ में उपस्थित कराएं। इस मामले पर न्याय विभाग के विशेष सचिव केशव गोयल विचार करेंगे। यानी जिस प्रकरण में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दर्ज मुकदमे में अभियोजन स्वीकृति पर विचार चल रहा है, उसी प्रकरण के प्रमुख आरोपितों में शामिल अधिकारी वर्तमान में फिर उसी व्यवस्था की कमान संभाले हुए हैं, जहां निजी अस्पतालों के पंजीकरण, नवीनीकरण, निरीक्षण और कार्रवाई जैसे अधिकार निहित हैं। इसी बीच 28 मई को दैनिक भास्कर की पड़ताल ने स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर नए सवाल खड़े कर दिए। पड़ताल में जिला मुख्यालय के आसपास पांच ऐसे अस्पताल और क्लीनिक चिन्हित किए गए थे, जिनके संचालन को लेकर गंभीर अनियमितताओं के आरोप सामने आए। इसके बाद विभाग की ओर से कार्रवाई का दावा किया गया, लेकिन कार्रवाई की तस्वीर बेहद कमजोर दिखाई दी। आरोग्य मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल, जनता क्लिनिक और अपेक्स अस्पताल को नोटिस जारी किए गए, लेकिन स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि नोटिस जारी होने के अगले ही दिन आरोग्य मल्टीस्पेशलिटी और जनता क्लिनिक फिर सामान्य रूप से संचालित होने लगे।
दूसरी ओर पड़ताल में सामने आए विनायक हॉस्पिटल और आलम डेंटल केयर पर नोटिस तक जारी न होने की चर्चा ने विभागीय कार्रवाई की निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यहीं से पूरे मामले का सबसे गंभीर पक्ष सामने आता है।
3 जून को लखनऊ में खुलेगी भ्रष्टाचार प्रकरण की फाइल:सिद्धार्थनगर में अवैध अस्पतालों पर मेहरबानी से घिरा स्वास्थ्य विभाग
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