उतरौला(बलरामपुर )। उतरौला शहर से लेकर देहात तक पारंपरिक कुओं को पाट दिया गया है। जिले में मिनरल वाटर के नाम पर लोगों को जहर परोसा जा रहा है। बिना लैब टेस्ट कराए ऐसे सैकड़ों प्लांट संचालित हो रहे हैं। सौ से अधिक प्लांट बिना मानकों के पूरे क्षेत्र में चल रहे हैं। शुद्ध व शीतल पानी के नाम पर असुरक्षित पानी पिलाकर उनकी सेहत से खिलवाड़ किया जा रहा है।
60-70 फीट तक खिसक गया भूगर्भ जलस्तर: पानी के अंधाधुंध दोहन से भूगर्भ जलस्तर 60-70 फीट तक नीचे चला गया है। इसी तरह उतरौला नगर सहित ग्रामीण क्षेत्रों मे कई अनियंत्रित आरओ प्लांट लग चुके हैं। सूत्रों के अनुसार जिम्मेदार अफसरों की मौन स्वीकृति से आरओ प्लांट धडल्ले से चल रहे हैं।
लोग तत्कालीन पानी का कर रहे सेवन’कर रहे हैं सीएचसी अधीक्षक उतरौला डा0 चन्द्र प्रकाश सिंह बताते हैं कि साफ पानी पीने का उद्देश्य निर्मल जुड़ा नहीं हो, लेकिन लोग स्वास्थ्य के नाम पर हम टीडीएस 100 से कम का प्रयोग कर रहे हैं। टीडीएस कम होने से पानी में आवश्यक खनिज तत्व खत्म हो जाते हैं। कम टीडीएस का पानी पीने से लोगों को पेट के साथ हड्डी, थायराइड व बाल संबंधी बीमारियां होती हैं। शहर में इन बीमारियों के तीन हजार से अधिक मरीज हैं।
मानकों की अनदेखी: इन पर हाथ डालने से जिम्मेदार कतरा रहे हैं। आसमान में भर रहे आरओ माफिया लगाने के बजाय 20 रुपये का सस्ता डिब्बा लेकर खूब पानी बेच रहे हैं। अधिकांश लोगों को यह पता ही नहीं कि वह तत्कालीन पानी पीकर अपनी हड्डियां गला रहे हैं।
फूड लाइसेंस की जांच जरूरी: अधोमानक संचालक बलाई चाट रहे हैं। असली घुसपैठ लगाने के लिए सबसे पहले घुमने विभाग से अनुमति लेनी होती है। इसके बाद जिस स्थान पर प्लांट लगाना है, वहां की स्थिति व साफ-सफाई भी मायने रखती है। पानी में आर्सेनिक, आयरन, सल्फेट, क्लोरीन, पानी की कठोरता समेत आवश्यक जांच के लिए जल संस्थान लखनऊ में लैब टेस्ट कराकर प्रमाण पत्र लेना होता है। साथ ही पंजीकरण कराकर लाइसेंस लेना भी अनिवार्य है।












