श्रावस्ती के नासिरगंज कस्बे में मोहर्रम का चांद दिखाई देने के साथ ही अज़ादारी का सिलसिला शुरू हो गया है। पहली मोहर्रम से ही अज़ादार हज़रत इमाम हुसैन और कर्बला के शहीदों की याद में गम में डूब गए हैं। घरों और इमामबाड़ों में मजलिसें आयोजित की जा रही हैं, जहां इमाम हुसैन और उनके 72 साथियों के बलिदान को याद किया जा रहा है। इस अवसर पर अज़ादारों ने काले लिबास धारण कर अपने शोक का इज़हार किया है। वहीं, महिलाएं परंपरा के अनुसार श्रृंगार और खुशी के प्रतीकों से परहेज कर रही हैं। पहली मोहर्रम से लेकर 8 रबीउल अव्वल तक, जो लगभग दो महीने आठ दिन की अवधि है, शिया समुदाय के लोग मजलिस, नौहा, मातम और जुलूसों के माध्यम से इमाम हुसैन की याद में अज़ादारी करते हैं। इस दौरान कई परिवारों में खुशी के कार्यक्रम आयोजित नहीं किए जाते और पूरा समय इबादत व अज़ादारी में व्यतीत किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कर्बला की जंग में हज़रत इमाम हुसैन ने सत्य, न्याय और इंसानियत की रक्षा के लिए अपने परिवार और साथियों सहित महान बलिदान दिया था। 10 मोहर्रम, जिसे यौम-ए-आशूरा के नाम से जाना जाता है, को इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत की याद में विशेष मजलिसें और मातम आयोजित किए जाते हैं। नासिरगंज कस्बे में मोहर्रम का आगाज़ पूरी अकीदत और गम के माहौल में हुआ है। आने वाले दिनों में विभिन्न धार्मिक कार्यक्रमों और मजलिसों का आयोजन जारी रहेगा।
नासिरगंज में मोहर्रम का आगाज:अजादार गम-ए-हुसैन में डूबे, घरों में मजलिसें शुरू
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