Homeजिला / लोकल (Local News)डिजिटल अरेस्ट के बढ़ते मामलों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त,एआई- मशीन लर्निंग पर...

डिजिटल अरेस्ट के बढ़ते मामलों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त,एआई- मशीन लर्निंग पर रोक लगाने की तैयारी


नई दिल्ली। देश में तेजी से बढ़ रहे ‘डिजिटल अरेस्ट’ मामलों पर सुप्रीम कोर्ट ने गहरी चिंता जताई है। सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि यह बेहद चौंकाने वाली स्थिति है कि उच्च शिक्षित लोग भी इस तरह के साइबर ठगी का शिकार हो रहे हैं।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने सुझाव दिया कि इस समस्या से निपटने के लिए इंटरमीडियरी प्लेटफॉर्म्स पर ‘किल स्विच’ जैसी व्यवस्था होनी चाहिए, जिससे पीड़ितों को तत्काल राहत मिल सके। उन्होंने कहा कि कई बार लोग ‘डिजिटल अरेस्ट’ के बारे में जानते हुए भी डर और घबराहट के कारण सही समय पर प्रतिक्रिया नहीं दे पाते हैं, जिसका फायदा अपराधी उठाते हैं।
इस पर अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमनी ने कोर्ट को बताया कि इस मुद्दे पर विभिन्न विभागों के बीच आंतरिक बैठकों का दौर चल रहा है और जल्द ही अंतिम बैठक भी आयोजित की जाएगी। उन्होंने सुझाव दिया कि इस मामले की अगली सुनवाई 12 मई को तय की जा सकती है।
इससे पहले भी शीर्ष अदालत इस मुद्दे को गंभीरता से ले चुकी है। 1 दिसंबर 2025 को कोर्ट ने डिजिटल अरेस्ट से जुड़े फजीर्वाड़े पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत बताते हुए संबंधित मामलों की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो को सौंपने का आदेश दिया था। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि साइबर अपराध में उपयोग किए गए संदिग्ध बैंक खातों की जांच में सीबीआई को पूर्ण स्वतंत्रता होगी।
कोर्ट ने भारतीय रिजर्व बैंक को भी निर्देश दिया था कि वह संदिग्ध बैंक खातों की पहचान कर उन्हें फ्रीज करने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग जैसी आधुनिक तकनीकों के उपयोग पर सुझाव दे। साथ ही, जिन राज्यों ने उइक जांच की अनुमति नहीं दी है, उन्हें भी डिजिटल अरेस्ट मामलों में जांच की मंजूरी देने को कहा गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने पहले इस तरह के मामलों को तीन श्रेणियों-डिजिटल अरेस्ट, निवेश ठगी और पार्ट-टाइम नौकरी के नाम पर ठगी में बांटा था। अदालत ने कहा था कि इन अपराधों में पीड़ितों को भारी रकम निवेश करने के लिए मजबूर किया जाता है।गौरतलब है कि कोर्ट ने अंबाला के एक बुजुर्ग दंपति से एक करोड़ रुपये से अधिक की ठगी के मामले में स्वत: संज्ञान लिया था। 
आरोपियों ने खुद को जांच एजेंसियों का अधिकारी बताकर फर्जी अदालत के आदेश दिखाए और वीडियो कॉल के जरिए ‘डिजिटल अरेस्ट’ का भय पैदा कर रकम वसूली। अदालत ने इस तरह की घटनाओं को न्यायिक संस्थाओं में लोगों के विश्वास पर गंभीर चोट बताया और कहा कि इससे निपटने के लिए केंद्र और राज्य एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय बेहद जरूरी है। 

RELATED ARTICLES
- Advertisment -
Google search engine

Most Popular

Recent Comments