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43 साल से चल रहा है मर्डर का केस, 28 साल का आरोपी अब 72 का हो गया

अदालतों में तारीख पर तारीख का रवैया तो बेहद पुराना है। अब एक ऐसा मामला सामने आया है जिस पर अदालत भी हैरान है। हत्या के एक मामले में निचली अदालत की ओर से दोषी करार दिए गए शख्स की उम्र अब 72 साल हो गई है और पिछले 43 साल से मुकदमा ही चल रहा है। अपने ही भाई की हत्या के मामले में दोषी करार दिए गए इस शख्स की याचिका के निपटारे में हुई देरी पर सुप्रीम कोर्ट ने भी चिंता जताई है। सुप्रीम कोर्ट ने सवाल भी पूछे हैं कि आखिर पेंडिंग केस की संख्या से निपटने के लिए क्या उपाय किए जा रहे हैं?

हाई कोर्ट ने 40 साल से ज्यादा पुराने एक मामले में दोषी करार दिए गए शख्स की याचिका पर मंगलवार को सुनवाई की। इस शख्स ने निचली अदालत के उस फैसले को चुनौती दी है जिसमें उसे दोषी ठहराया गया था और उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस ए एस चंदुरकर की पार्शियल वर्किंग डे (पीडब्ल्यूडी) बेंच ने सोमवार को स्थिति को चिंताजनक बताया और सवाल उठाया कि इलाहाबाद हाई कोर्ट में लंबित मामलों की बढ़ती संख्या से निपटने के लिए कौन से नए उपाय अपनाए जा सकते हैं क्योंकि ये लंबित मामले न्याय व्यवस्था को बाधित करते हैं।

भाई की हत्या करने का है मामला

इस मामले में याचिकाकर्ता का नाम विजय सिंह है। उसे नवंबर 1983 में अपने भाई को गोली मारकर उसकी हत्या करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था और तब उसकी उम्र 28 वर्ष थी। कानपुर की एक अदालत ने उसे हत्या का दोषी पाया और दिसंबर 1985 में आजीवन कारावास की सजा सुनाई। विजय सिंह ने इस फैसले को इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनौती दी। उसकी अपील लगभग 41 साल तक पेंडिग रही और आखिरकार इस साल 9 फरवरी को हाई कोर्ट के 20 पन्नों के फैसले के जरिए याचिका खारिज कर दी गई।

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सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने गौर किया कि विजय सिंह ने हिरासत में केवल लगभग तीन महीने बिताए थे और अपनी अपील के नतीजे का इंतजार करते हुए लगभग 43 वर्ष तक जमानत पर रहा था। अब सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जब तक उसके समक्ष कार्यवाही लंबित रहेगी तब तक जमानत जारी रखी जाएगी। इस बेंच ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में मामलों के निपटारे में लगातार हो रही लंबी देरी पर चिंता व्यक्त की और कहा कि लंबित मामलों की संख्या अधिक होने के कारण याचिकाकर्ता अक्सर शीघ्र सुनवाई के निर्देश का अनुरोध लेकर सुप्रीम कोर्ट का रुख करते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने उठाए सवाल

जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा ने वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे और अधिवक्ता जोहेब हुसैन से पुराने मामलों के निपटारे में तेजी लाने के उपायों पर सुझाव मांगे। इस पर सिद्धार्थ दवे ने सुझाव दिया कि लंबित मामलों की संख्या कम करने के लिए तीन दशकों से अधिक समय से लंबित अभियोजन अपीलों को खारिज किया जा सकता है। हालांकि, बेंच ने इस विचार को अस्वीकार कर दिया और कहा कि न्यायिक निर्णय के मूलभूत सिद्धांत केवल मामलों के लंबे समय तक लंबित रहने के आधार पर उन्हें खारिज करने की अनुमति नहीं देते।

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बेंच ने चेतावनी दी कि इस तरह का दृष्टिकोण जनहित को बुरी तरह से प्रभावित कर सकता है और पक्षों को अपना पक्ष प्रस्तुत करने के अवसर से वंचित कर सकता है। विजय सिंह ने लंबे समय तक हुई देरी पर प्रकाश डालते हुए कहा कि अब उनकी उम्र 72 साल है और उन्होंने अपनी युवावस्था, प्रौढ़ावस्था और वृद्धावस्था आपराधिक दोष सिद्धि के साए में बिताई है। याचिका में कहा गया है, ‘चार दशकों से अधिक समय से, युवावस्था, प्रौढ़ावस्था और अब वृद्धावस्था के दौरान वह दोष सिद्धि के साए में जी रहे हैं।’ याचिका में यह भी कहा गया है कि सुनवाई से पूर्व उनकी आपराधिक अपील हाई कोर्ट में 40 वर्षों तक लंबित रही और खारिज कर दी गई।

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