HomeHealth & Fitnessआंकड़ों में दिखी टीबी की असली चुनौती  

आंकड़ों में दिखी टीबी की असली चुनौती  

लखनऊ। टीबी पूरी तरह से इलाज योग्य बीमारी है,लेकिन 100 दिवसीय सघन टीबी अभियान के आंकड़े बताते हैं कि सबसे बड़ी चुनौती बीमारी का उपचार नहीं, बल्कि समय रहते मरीजों की पहचान कर उन्हें जांच और उपचार से जोड़ना है। ये बातें सीएमओ डॉ.एनबी. सिंह ने कही। उन्होंने बताया कि यह अभियान इस बात का संकेत है कि टीबी आज भी एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बनी हुई है। उन्होंने कहा कि कई लोग शुरुआती लक्षणों—लगातार खांसी, बुखार, वजन कम होना, भूख न लगना या बलगम में खून आना—को सामान्य बीमारी समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। डॉ.एनबी.के मुताबिक,परिणामस्वरूप मरीज समय पर स्वास्थ्य सेवाओं तक नहीं पहुंच पाते और संक्रमण दूसरों तक फैलने का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में सक्रिय टीबी खोज अभियान संक्रमण की श्रृंखला को तोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। उन्होंने बताया कि अभियान के दौरान 2.8 लाख लोगों की स्क्रीनिंग की गई। इनमें 39600, व्यक्तियों में संभावित टीबी के लक्षण पाए गए। जांच के बाद 9370 नए मरीजों में टीबी की पुष्टि हुई और सभी को निशुल्क उपचार से जोड़ा गया। अभियान की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि यह रही कि 3560 ऐसे मरीजों की भी पहचान की गई, जिनमें टीबी के कोई स्पष्ट लक्षण नहीं थे। समय रहते ऐसे मरीजों का पता लगाकर उन्हें उपचार से जोड़ना संक्रमण के प्रसार को रोकने की दिशा में बेहद महत्वपूर्ण कदम है।
मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने कहा कि ये आंकड़े केवल मरीजों की संख्या नहीं दर्शाते, बल्कि यह भी बताते हैं कि समुदाय में ऐसे कई टीबी मरीज मौजूद हो सकते हैं, जिनकी पहचान अभी तक नहीं हो पाई है। इसलिए सक्रिय खोज, समय पर जांच, शीघ्र उपचार और जनभागीदारी के माध्यम से ही टीबी संक्रमण की श्रृंखला को तोड़ा जा सकता है तथा टीबी मुक्त भारत के लक्ष्य को साकार किया जा सकता है। जिला क्षय रोग अधिकारी डॉ. ए.के. सिंघल ने बताया कि इन 100 दिनों के दौरान 301 आयुष्मान आरोग्य शिविरों का आयोजन किया गया। इसके साथ ही अभियान के तहत 1924 निक्षय मित्र प्रधानमंत्री टीबी मुक्त भारत अभियान से जुड़े और उनके माध्यम से 7800 टीबी मरीजों को गोद लेकर पोषण पोटली उपलब्ध कराई गई।

 
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