इटवा कस्बे के जनता सेवा हॉस्पिटल में नवजात शिशु की मौत के मामले की जांच अब तकनीकी और दस्तावेजी साक्ष्यों पर केंद्रित हो गई है। मुख्य चिकित्सा अधिकारी द्वारा निर्धारित एक सप्ताह की समयसीमा बीतने के बाद, जांच अधिकारी ने अस्पताल प्रबंधन को अंतिम चेतावनी नोटिस जारी किया है, जिससे अस्पताल की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं। मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉक्टर रजत कुमार चौरसिया ने 26 मई को तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन किया था और एक सप्ताह के भीतर रिपोर्ट मांगी थी। हालांकि, नौ दिन से अधिक समय बीत जाने के बावजूद जांच किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाई है। जांच टीम अभी भी संबंधित चिकित्सक के बयान का इंतजार कर रही है। जांच में देरी के कारण, एसीएमओ (आरसीएच) और जांच अधिकारी डॉ. आर.जी. सिंह ने अस्पताल प्रबंधन को यह अंतिम चेतावनी नोटिस जारी किया है। इस मामले में ऑपरेशन करने वाले चिकित्सक को लेकर विवाद गहरा गया है। पीड़िता वंदना ने एक वीडियो बयान में दावा किया है कि 23 मई की रात उसका ऑपरेशन डॉ. डाली शर्मा ने नहीं किया था। वंदना के अनुसार, ऑपरेशन के समय डॉ. प्रवीण कुमार यादव, प्रमोद कुमार यादव और एक नर्स मौजूद थे। इसके विपरीत, अस्पताल प्रबंधन ने जांच के दौरान डॉ. डाली शर्मा का बयान प्रस्तुत किया है। दोनों पक्षों के बयानों में यह विरोधाभास मामले को और गंभीर बना रहा है। पीड़ित परिवार ने अब केवल मौखिक बयानों को पर्याप्त मानने से इनकार कर दिया है। परिवार ने घटना के समय अस्पताल में मौजूद लोगों की मोबाइल लोकेशन, कॉल डिटेल रिकॉर्ड (सीडीआर), सीसीटीवी फुटेज और डीवीआर रिकॉर्ड की गहन जांच की मांग की है। परिवार का दावा है कि इन रिकॉर्ड्स की जांच से यह स्पष्ट हो जाएगा कि घटना के समय कौन अस्पताल में उपस्थित था और कौन नहीं था। परिवार का कहना है कि यदि किसी चिकित्सक के अस्पताल में मौजूद होने का दावा किया जा रहा है तो उसकी मोबाइल लोकेशन और कॉल रिकॉर्ड से वास्तविक स्थिति सामने आ सकती है। इसी प्रकार अस्पताल के सीसीटीवी फुटेज और डीवीआर रिकॉर्ड भी यह स्पष्ट कर सकते हैं कि ऑपरेशन थिएटर में कौन-कौन गया, किसने मरीज को देखा और घटना के समय अस्पताल में किसकी सक्रिय भूमिका थी। हालांकि पुलिस पहले ही अस्पताल प्रबंधन और संबंधित स्टाफ के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर चुकी है। पुलिस अस्पताल का डीवीआर अपने कब्जे में लेकर जांच कर रही है। जांच के दायरे में अस्पताल के अभिलेख भी हैं। गर्भावस्था के दौरान उपचार किसने किया, दवाइयां किस डॉक्टर ने लिखीं, पर्चों पर दर्ज हैंडराइटिंग किसकी है, अस्पताल में फुल टाइम चिकित्सक के रूप में कौन-कौन पंजीकृत हैं और घटना के समय वास्तविक रूप से कौन चिकित्सा सेवाएं दे रहा था, यह सब अब जांच के अहम विषय बन चुके हैं। जांच अधिकारी द्वारा जारी अंतिम नोटिस ने यह संकेत दे दिया है कि स्वास्थ्य वि भाग अब मामले को लंबा खींचने के बजाय उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर निष्कर्ष तक पहुंचना चाहता है।
वंदना बोली- ऑपरेशन प्रवीण और प्रमोद ने किया:अस्पताल ने दूसरी डॉक्टर का नाम लिया, सिद्धार्थनगर में हुई थी नवजात की मौत
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